Skip to main content

Birsa Times

कोलकाता आइपैक छापेमारी विवाद: सीएम ममता बनर्जी के आचरण ने लोकतंत्र को खतरे में डाला: सुप्रीम कोर्ट

कोलकाता आइपैक छापेमारी विवाद: सीएम ममता बनर्जी के आचरण ने लोकतंत्र को खतरे में डाला: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में I-PAC के कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कथित हस्तक्षेप पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि यदि कोई मुख्यमंत्री जांच के दौरान मौके पर पहुंचकर कार्रवाई में हस्तक्षेप करता है, तो इसे केवल केंद्र और राज्य के बीच का विवाद नहीं माना जा सकता। यह मामला कानून के शासन, संवैधानिक मर्यादा और जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता से जुड़ा है।

यह मामला जनवरी 2026 में कोलकाता में हुई ED की तलाशी कार्रवाई से संबंधित है। एजेंसी ने आरोप लगाया है कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के कुछ अधिकारियों ने उसकी कार्रवाई में बाधा डाली थी। हालांकि, ये आरोप हैं और मामले में पक्षों की दलीलों तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

मुख्यमंत्री के कथित हस्तक्षेप पर अदालत ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार की दलीलों पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि किसी संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति यदि सक्रिय जांच के दौरान मौके पर पहुंचता है और कार्रवाई में हस्तक्षेप करता है, तो इससे जांच एजेंसियों के स्वतंत्र रूप से काम करने के अधिकार से जुड़े गंभीर प्रश्न उठते हैं।

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस तर्क पर भी सवाल किया कि मामले को केंद्र और राज्य के बीच विवाद के रूप में देखा जाना चाहिए। पीठ के अनुसार, किसी मुख्यमंत्री के कथित आचरण को केवल संघीय ढांचे से जुड़े विवाद तक सीमित नहीं किया जा सकता।

केशवानंद भारती फैसले का भी हुआ उल्लेख

सुनवाई के दौरान संविधान और मौलिक अधिकारों से जुड़े कानूनी सिद्धांतों पर भी चर्चा हुई। अदालत ने केशवानंद भारती मामले सहित संवैधानिक न्यायशास्त्र के महत्वपूर्ण संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियां कानून के शासन और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली से जुड़े सवाल खड़े करती हैं।

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी संस्था या पदाधिकारी की कार्रवाई संविधान और कानून के दायरे में होनी चाहिए।

अनुच्छेद 32 के तहत याचिका पर भी बहस

मामले की सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से ED की याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए गए। राज्य सरकार की दलील थी कि यदि विवाद केंद्र और राज्य के बीच का है, तो उसके लिए संविधान में निर्धारित दूसरे कानूनी रास्तों पर विचार किया जाना चाहिए।

वहीं, ED की ओर से कहा गया कि उसके अधिकारियों को कथित तौर पर जांच करने से रोका गया और उनके अधिकार प्रभावित हुए। एजेंसी ने मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में सवाल उठाया कि क्या ED के अधिकारी सरकारी एजेंसी में काम करने के कारण अपने व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों से वंचित हो जाते हैं। अदालत के सामने यह मुद्दा भी है कि जांच में कथित बाधा और अधिकारियों के अधिकारों से जुड़े सवालों पर अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई की जा सकती है या नहीं।

क्या है पूरा मामला?

ED ने 8 जनवरी 2026 को कोलकाता में राजनीतिक परामर्श कंपनी I-PAC के कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर तलाशी ली थी। यह कार्रवाई कथित अवैध कोयला खनन और उससे जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के सिलसिले में की गई थी।

ED का आरोप है कि तलाशी के दौरान ममता बनर्जी और राज्य के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के हस्तक्षेप से उसकी कार्रवाई प्रभावित हुई। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री और उनके पक्ष की ओर से इस घटनाक्रम को लेकर अलग दलीलें दी गई हैं। उनका कहना रहा है कि I-PAC तृणमूल कांग्रेस के चुनावी काम से जुड़ा था और वहां पार्टी से संबंधित संवेदनशील सामग्री मौजूद थी।

सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में कानूनी सवालों पर विचार किया जा रहा है। अदालत की टिप्पणियों को अंतिम फैसले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए; मामले का अंतिम निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा।

administrator

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *