– जमुई में शर्मनाक घटना पर समाज के सामने खड़ा बड़ा सवाल
रंजीत विद्यार्थी
महाभारत में द्रौपदी का चीरहरण केवल इसलिए संभव नहीं हुआ था कि सभा में अपराधी मौजूद थे। यह इसलिए भी संभव हुआ क्योंकि सभा में बहुत से लोग मौजूद होकर भी निर्णायक क्षण में खामोश रहे। सत्ता, व्यवस्था और समाज—तीनों के बीच पसरा वह मौन आज भी हमारे सामने एक असहज सवाल की तरह खड़ा है।
बिहार के जमुई में नाबालिग छात्र-छात्राओं के साथ सड़क पर कथित बदसलूकी, मारपीट और यौन उत्पीड़न की घटना के वायरल वीडियो ने इसी सवाल को फिर सामने ला दिया है। घटना की जांच और कानूनी कार्रवाई का अपना रास्ता है, लेकिन वीडियो में दिखाई देने वाली भीड़ का व्यवहार उससे अलग एक सामाजिक प्रश्न खड़ा करता है।
अगर किसी सार्वजनिक जगह पर बच्चों के साथ ज्यादती हो रही हो और आसपास खड़े लोग मदद करने के बजाय मोबाइल से दृश्य रिकॉर्ड करने लगें, तो सवाल केवल आरोपियों से नहीं, उस समाज से भी पूछा जाना चाहिए जो अपराध को अपनी आंखों के सामने घटते देखता है।
सबसे बड़ा संकट शायद यही है कि हम हिंसा के सामने खड़े तो होते हैं, लेकिन प्रतिरोध के लिए नहीं—रिकॉर्ड करने के लिए।
मोबाइल फोन ने हमारी आंखों के सामने घटने वाली घटनाओं को तत्काल डिजिटल सामग्री में बदलने की ताकत दे दी है। जो घटना कुछ वर्ष पहले केवल वहां मौजूद लोगों की स्मृति में रहती, वह अब कुछ सेकंड में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। लेकिन इस सुविधा के साथ एक नैतिक जिम्मेदारी भी आती है।
किसी अपराध का प्रमाण सुरक्षित करना और किसी पीड़ित की बेबसी को मनोरंजन या प्रसार की सामग्री बना देना दो अलग बातें हैं।
जमुई के मामले में भी यही फर्क समझना जरूरी है।
किसी घटना का वीडियो जांच में महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है। लेकिन उसी वीडियो को बार-बार साझा करना, उसमें पीड़ितों की पहचान उजागर करना या उसे सनसनीखेज सामग्री की तरह प्रसारित करना पीड़ित की पीड़ा को बढ़ा सकता है। खासकर जब पीड़ित नाबालिग हों, तब उनकी गरिमा और पहचान की रक्षा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
अपराध के बाद न्याय की एक प्रक्रिया होती है। लेकिन डिजिटल दुनिया में पीड़ित के लिए घटना वहीं खत्म नहीं होती। वीडियो अगर इंटरनेट पर फैल गया तो वह बार-बार सामने आ सकता है। यानी अपराध का एक क्षण डिजिटल स्मृति में लंबे समय तक जीवित रह सकता है। पीड़ित को उस घटना से बाहर निकलने के लिए जितना संघर्ष करना होगा, उतना ही इंटरनेट उसे बार-बार पीछे खींच सकता है।
यह कैसी संवेदना है कि किसी की चीख हमारे भीतर मदद की इच्छा नहीं, कैमरा निकालने की इच्छा पैदा करे?
मनोविज्ञान में ‘बायस्टैंडर इफेक्ट’ की चर्चा होती है—भीड़ में मौजूद व्यक्ति कई बार यह मान लेता है कि कोई दूसरा मदद करेगा। परिणाम यह होता है कि जिम्मेदारी सबके बीच बंटकर किसी एक के हिस्से नहीं आती। डिजिटल युग ने इस प्रवृत्ति को एक नया रूप दे दिया है। अब व्यक्ति यह सोच सकता है कि मैं तो वीडियो बना रहा हूं, कोई दूसरा पुलिस को सूचना दे देगा।
लेकिन अपराध के सामने नागरिकता का पहला अर्थ दर्शक होना नहीं है।
हर व्यक्ति अपराधी से भिड़ने की स्थिति में हो, यह जरूरी नहीं। यह भी नहीं कहा जा सकता कि भीड़ में मौजूद हर व्यक्ति कानून अपने हाथ में लेकर हस्तक्षेप करे। लेकिन मदद करने के सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके जरूर हो सकते हैं—पुलिस को सूचना देना, आपात सेवा बुलाना, आसपास के जिम्मेदार लोगों को जुटाना, पीड़ित को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की कोशिश करना और घटना के प्रमाण को जिम्मेदारी से सुरक्षित रखना।
साहस का अर्थ हमेशा शारीरिक टकराव नहीं होता। कई बार समय पर की गई एक सूचना भी किसी की जिंदगी बदल सकती है।
इसलिए जमुई की घटना को केवल ‘भीड़ की संवेदनहीनता’ कहकर आगे बढ़ जाना भी पर्याप्त नहीं होगा। हमें यह समझना होगा कि लोग हस्तक्षेप क्यों नहीं करते।
एक कारण भय हो सकता है। अपराधियों से टकराने का डर, बाद की पुलिस कार्रवाई का डर, अदालत के चक्कर का डर या प्रतिशोध की आशंका—ये वास्तविक चिंताएं हैं। इसलिए नागरिकों से केवल नैतिक साहस की मांग करना पर्याप्त नहीं है। राज्य को ऐसी व्यवस्था भी बनानी होगी जिसमें अपराध की सूचना देने वाला व्यक्ति अनावश्यक उत्पीड़न से सुरक्षित रहे और गवाहों को सुरक्षा का भरोसा मिले।
दूसरा कारण है सामाजिक उदासीनता। ‘मुझे क्या लेना-देना’ वाली मानसिकता धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन की सबसे खतरनाक आदत बन सकती है।
सड़क पर किसी महिला के साथ बदसलूकी हो, दुर्घटना में कोई घायल पड़ा हो, किसी कमजोर व्यक्ति पर हमला हो या किसी बच्चे के साथ ज्यादती हो—अगर हमारा पहला विचार यह हो कि यह मेरा मामला नहीं है, तो धीरे-धीरे सार्वजनिक स्थानों पर कानून और नागरिकता दोनों कमजोर पड़ेंगे।
आज किसी और का बच्चा सड़क पर असुरक्षित है। कल वही स्थिति हमारे अपने घर तक पहुंच सकती है।
समाज केवल कानून से नहीं चलता। कानून अपराध होने के बाद सक्रिय होता है। समाज की संवेदना अपराध होने से पहले और अपराध घटते समय भी भूमिका निभाती है। इसलिए सार्वजनिक सुरक्षा केवल पुलिस की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। पुलिस की जिम्मेदारी अपनी जगह है, प्रशासन की अपनी और नागरिक समाज की अपनी।
जमुई की घटना में पुलिस की भूमिका, घटना की परिस्थितियां, आरोपियों की पहचान और कार्रवाई—इन सबका निर्धारण जांच और आधिकारिक तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। केवल वायरल वीडियो के आधार पर पूरे प्रशासन या पूरे समाज के बारे में निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा। लेकिन अगर सार्वजनिक स्थान पर अपराध हुआ और वहां मौजूद लोगों ने सक्रिय मदद नहीं की, तो उस व्यवहार पर सामाजिक बहस जरूर होनी चाहिए।
क्योंकि यह समस्या केवल जमुई की नहीं है।
हमने एक ऐसी डिजिटल संस्कृति विकसित कर ली है जिसमें ‘वायरल’ होना कई बार घटना से ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई देने लगता है। दुर्घटना का दृश्य हो तो कैमरा निकलता है। मारपीट हो तो कैमरा निकलता है। किसी की निजी त्रासदी हो तो कैमरा निकलता है। मानो हर घटना पहले ‘कंटेंट’ है और बाद में मनुष्य की जिंदगी।
यहां तकनीक को दोष देकर हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। मोबाइल फोन संवेदनशील भी बनाया जा सकता है और असंवेदनशील भी। वही कैमरा किसी अपराध का प्रमाण सुरक्षित कर सकता है और वही कैमरा पीड़ित की गरिमा को चोट पहुंचा सकता है। समस्या उपकरण में कम और उसके इस्तेमाल की नैतिकता में अधिक है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की अपनी जिम्मेदारी है। नाबालिगों और यौन हिंसा के मामलों में संवेदनशील सामग्री के प्रसार को रोकना, रिपोर्टिंग की सुविधा देना और पीड़ित की पहचान की रक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था करना जरूरी है। लेकिन प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी के साथ उपयोगकर्ता की जिम्मेदारी भी जुड़ी है।
हर वह चीज जिसे हम रिकॉर्ड कर सकते हैं, उसे साझा करना जरूरी नहीं है।
किसी पीड़ित का चेहरा धुंधला कर देने से ही हमारी जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। हमें यह भी देखना होगा कि उस वीडियो को साझा करने का सार्वजनिक हित क्या है। अगर वह जांच के लिए जरूरी है तो उसे संबंधित एजेंसी तक पहुंचाना एक बात है; उसे मनोरंजन, सनसनी या ‘वायरल’ सामग्री बनाना दूसरी।
यहीं शिक्षा की भूमिका भी सामने आती है।
हम बच्चों को प्रतियोगिता में आगे बढ़ना सिखाते हैं। उन्हें अच्छे अंक, अच्छी नौकरी और सफल करियर के लिए तैयार करते हैं। लेकिन क्या हम उन्हें यह भी सिखाते हैं कि सार्वजनिक जगह पर किसी कमजोर व्यक्ति के साथ अन्याय हो तो क्या करना चाहिए? क्या हम उन्हें सहमति, गरिमा, लैंगिक सम्मान और नागरिक जिम्मेदारी के बारे में पर्याप्त बताते हैं?
चरित्र निर्माण का अर्थ केवल नैतिक उपदेश देना नहीं है। इसका अर्थ है ऐसी परिस्थितियों के लिए तैयार करना, जहां सही और गलत के बीच चुनाव करना पड़े।
परिवार, विद्यालय और समाज—तीनों को इस संवाद को फिर शुरू करना होगा।
साथ ही, न्याय व्यवस्था में भी यह संदेश स्पष्ट होना चाहिए कि सार्वजनिक स्थान पर महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध हिंसा को गंभीरता से लिया जाए। आरोपियों की पहचान, जांच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया कानून के अनुसार तेजी और निष्पक्षता से आगे बढ़े। लेकिन ‘कठोर सजा’ की मांग के साथ यह भी जरूरी है कि जांच मजबूत हो, साक्ष्य सुरक्षित रहें और न्याय प्रक्रिया विश्वसनीय हो। केवल गिरफ्तारी की तस्वीर न्याय नहीं होती।
जमुई की घटना हमें एक और बात याद दिलाती है—वीडियो बनाना और नागरिक होना एक ही बात नहीं है।
कैमरे में दर्ज आंखें गवाह हो सकती हैं, लेकिन नागरिकता की परीक्षा इस बात से होती है कि संकट की घड़ी में हाथ क्या करते हैं। फोन से बनाया गया वीडियो अपराध का रिकॉर्ड बन सकता है, मगर समय पर किया गया फोन किसी की जान बचा सकता है।
हमें तय करना होगा कि सार्वजनिक जीवन में हमारी पहली प्रतिक्रिया क्या होगी—रिकॉर्ड या मदद?
महाभारत की सभा में द्रौपदी की पुकार के बीच खड़ा मौन इतिहास में दर्ज है। आज हमारे हाथ में मोबाइल है, सामने कैमरा है और एक बटन से घटना दुनिया तक पहुंच सकती है। तकनीक बदल गई है, लेकिन सवाल वही है—अन्याय के सामने हम क्या करते हैं?
जमुई की घटना का उत्तर केवल अदालत और पुलिस को नहीं देना है। समाज को भी देना है।
अपराधियों को कानून के अनुसार जवाबदेह बनाना जरूरी है। प्रशासन को अपनी भूमिका निभानी होगी। सोशल मीडिया कंपनियों को जिम्मेदार व्यवहार सुनिश्चित करना होगा। और नागरिकों को यह तय करना होगा कि किसी की पीड़ा उनके लिए ‘वायरल सामग्री’ नहीं, मदद की पुकार है।
तमाशबीन समाज से संवेदनशील समाज की यात्रा बहुत बड़ी नहीं है। शुरुआत केवल इतनी हो सकती है कि अगली बार सड़क पर कोई घायल मिले तो कैमरा निकालने से पहले हाथ बढ़े; कोई अपराध होते दिखे तो वीडियो साझा करने से पहले पुलिस को सूचना जाए; और किसी पीड़ित की पहचान बचाना हमें उतना ही जरूरी लगे जितना अपराधी की पहचान सामने लाना।
मोबाइल की स्क्रीन पर आती हर तस्वीर के पीछे एक मनुष्य है। यह याद रह गया तो शायद हमारी संवेदनाएं अभी पूरी तरह मरी नहीं हैं।
