-सरकारी सिस्टम से हारे पिता का सपना बेटे ने किया साकार; मछली पालन से लाखों की कमाई कर 40 बेरोजगारों को दिया रोजगार।
-खुद को बेरोजगार समझने वालों के लिए प्रेरणा बने रंजीत रविदास; केज कल्चर तकनीक अपनाकर चतरा में लिख रहे सफलता की नई इबारत।
-निराशा को हथियार बनाकर रंजीत बने ‘मत्स्यवीर’; बक्सा डैम में मछली पालन कर झारखंड और बिहार के 40 परिवारों का बने सहारा
-आदिवासी एक्सप्रेस / संतोष कुमार दास
इटखोरी (चतरा) : हमारे समाज में अक्सर यह मान लिया जाता है कि ‘सरकारी नौकरी ही सफल जीवन की अंतिम गारंटी है।’ जो युवा नौकरी नहीं पाते, वे खुद को बेरोजगार और असफल मानकर हताश हो जाते हैं। लेकिन, चतरा जिले के इटखोरी से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो इस पुरानी सोच को पूरी तरह से ध्वस्त कर देती है। जब सिस्टम की खामियों और गरीबी ने एक पिता से उसकी योग्यता के बावजूद नौकरी छीन ली, तो बेटे ने उस दर्द को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। आज वही बेटा न सिर्फ आत्मनिर्भरता की बेमिसाल कहानी लिख रहा है, बल्कि 40 अन्य परिवारों के लिए भगवान बन गया है। यह चतरा जिले का सबसे बड़ा 300 हेक्टेयर में फैला ऐतिहासिक बक्सा डैम है। और यह हैं टूना टांड़ पंचायत के माधोपुर गांव के रहने वाले रंजीत रविदास। इनकी कामयाबी की नींव दरअसल इनके पिता, बिराज रविदास के एक टूटे हुए सपने पर रखी है। साल 2004 की बात है, बिराज ने झारखंड पुलिस की परीक्षा और हजारीबाग में शारीरिक दौड़ दोनों पास कर ली थी। लेकिन नियुक्ति के वक्त बिचौलियों ने घूस (डोनेशन) की मांग कर दी। हालात ऐसे थे कि परिवार के पास ठीक से खाने को नहीं था, घूस के पैसे कहां से लाते? बिना पैसे नौकरी नहीं मिली। इस कड़वे सच ने पिता को यह सिखा दिया कि अब बेटे को इस भ्रष्ट सिस्टम में नहीं धकेलना है। 2007 में मैट्रिक करने के बाद रंजीत ने भी सरकारी नौकरी के पीछे भागने के बजाय खुद का बॉस बनने की ठान ली। बिना ज्ञान के कोई व्यापार सफल नहीं होता। रंजीत ने 2008 में रांची (धुर्वा) के मत्स्य विभाग से ट्रेनिंग ली। सीखने की भूख उन्हें नागपुर और फिर पुणे तक ले गई, जहां उन्होंने महीनों तक मछली पालन की बारीकियां समझीं। गांव लौटकर 2014 में उन्होंने 1 लाख रुपये सालाना की दर से बक्सा डैम को लीज पर ले लिया। आज वे यहां आधुनिक ‘केज कल्चर’ (Cage Culture) तकनीक से रेहू, कतला, मृगल, ग्लासकर, सिल्वर, कॉमन कार्प, तेलपिया, पंगास और झींगा जैसी कई मछलियों का शानदार उत्पादन कर रहे हैं। बक्सा डैम के मीठे पानी में पलने के कारण इन मछलियों का स्वाद इतना खास होता है कि इसकी डिमांड केवल चतरा में नहीं, बल्कि पूरे झारखंड (हजारीबाग, कोडरमा, रांची, बोकारो), बिहार (समस्तीपुर, गया, औरंगाबाद, मोतिहारी) और पश्चिम बंगाल के अंतरराज्यीय बाजारों तक है। आज रंजीत हर दिन 10 हजार से लेकर 20 हजार रुपये तक की मछलियां बेचते हैं। इस तरह उनका सालाना टर्नओवर 36 लाख से 50 लाख रुपये तक पहुंच गया है। कभी नौकरी के लिए मोहताज यह परिवार आज खुद ‘रोजगार प्रदाता’ बन गया है। रंजीत ने कुल 40 लोगों को काम दिया है। इनमें 30 स्थानीय लोग हैं, जिनमें 10 महिलाएं शामिल हैं, जो मछलियों को बाजार तक पहुंचाकर बेचने का काम करती हैं। वहीं, पड़ोसी राज्य बिहार के मोतिहारी से आए 10 लोग (जैसे वकील साहनी) जाल बनाने और डैम की 24 घंटे देखभाल का काम करते हैं। रंजीत रविदास का यह शानदार सफर हर उस युवा के लिए एक करारा तमाचा है जो नौकरी न मिलने पर जिंदगी को खत्म मान लेते हैं। रंजीत ने साबित कर दिया है कि अगर सीने में कुछ कर गुजरने की आग हो, तो इंसान अपनी किस्मत खुद लिख सकता है और दूसरों की जिंदगी भी रोशन कर सकता है। चतरा से आत्मनिर्भरता की इस विशेष पेशकश में इतना ही।
नौकरी ही जिंदगी नहीं! चतरा के रंजीत ने बक्सा डैम में मछली पालन कर पेश की आत्मनिर्भरता की मिसाल, सालाना कमा रहे 36 लाख
