-जेल एवं सदर अस्पताल के सिस्टम ने ली एचआईवी पॉजिटिव बंदी की जान
-सिस्टम बना रहा गैर जवाबदेह और मृत्यु के पहले कागज पर सारी व्यवस्था बता दी
-अधिवक्ता ने 13 जुलाई को दिया था इलाज हेतु भागलपुर भेजने का आवेदन
-मेडिकल बोर्ड गठित करने में इतना विलंब आखिर क्यों लगा ?
-रंजीत कुमार विद्यार्थी
मुंगेर : जिलें के असरगंज के एचआईवी पॉजिटिव मरीज एवं विचाराधीन बंदी संजय साह की मौत जेल एवं अस्पताल प्रशासन की लापरवाही से बीते 04 अगस्त की शाम सदर अस्पताल में इलाज के दौरान हो गई। मौत के दिन मरीज का बेहतर इलाज लिए मेडिकल बोर्ड का गठन कर जेएलएनएम अस्पताल, भागलपुर भेजने कि अनुशंसा की गई और इसी दिन कारा अधीक्षक ने गाड़ी, ईंधन एवं सुरक्षा कर्मी उपलब्ध कराने हेतु पुलिस अधीक्षक को पत्र भी लिखा गया। पुलिस अधीक्षक ने इसी दिन सारी व्यवस्था भी कर दी, लेकिन इसके बावजूद भी विचाराधीन कैदी की मौत सदर अस्पताल में हो गयी। जबकि कैदी को इलाज के लिए जेल से सर्वप्रथम 21जुलाई को सदर अस्पताल लाया गया था, लेकिन सिस्टम गैर जवाबदेह रही और मृत्यु के पहले कागज पर सारी व्यवस्था बता दी।
कारा अधीक्षक ने दिया प्रतिवेदन
बंदी संजय साह के इलाज व मौत के संबंध में कारा अधीक्षक ने 05 अगस्त को संबोधित न्यायालय मैजिस्ट्रेट प्रथम क्षेणी अनन्या के न्यायालय , सीजेएम एवं जिला जज तथा अन्य को प्रतिवेदन देकर बताया है कि कोर्ट के आदेश के आलोक में बंदी को 21 जुलाई को इलाज हेतु सदर अस्पताल भेजा गया था । पुनः जांच हेतु 22 जुलाई को भेजा गया फिर वापस जेल आ गया। इसके बाद 02 एवं 03 अगस्त को बंदी को इलाज हेतु सदर अस्पताल भेजा गया फिर जेल वापस लाया गया। फिर 03 अगस्त के रात्रि में बंदी का अत्यधिक तबीयत बिगड़ने के बाद सदर अस्पताल भेजा गया और अगले दिन 04 अगस्त को शाम में उसकी मौत हो गई।
असरगंज थाना कांड संख्या 93/2026 में गया था जेल
असरगंज थाना क्षेत्र के मसुदनपुर कमरांय गांव के स्व नुन्दर साह के पुत्र संजय साह मारपीट के मामले में 23 जून को न्यायिक अभिरक्षा में मंडल कारा, मुंगेर भेजा गया था। एचआईवी का रेगुलर इलाज के अभाव में बंदी संजय साह की हालत बिगड़ी तो उनके अधिवक्ता अंजन कुमार सिंह ने कोर्ट में आवेदन दिया। जिसमे उन्होंने बताया की बंदी संजय साह वर्ष 2014 से एचआईवी पॉजिटिव मरीज है। प्रत्येक माह जांच एवं इलाज हेतु जेएलएनएम अस्पताल जाते हैं। अतः उन्होंने इलाज हेतु भागलपुर भेजने का आदेश कारा अधीक्षक को दिया जाय। इसके बावजूद भी कारा अधीक्षक ने गंभीर रोगी संजय के प्रति संवेदनशील नहीं रही और इलाज के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति हूई । जिस वजह से संजय साह की मौत हो गई।
वहीं, सदर अस्पताल के डाक्टर जो मंडल कारा में प्रतिनियुक्ति है, वे रेगुलर ड्यूटी मंडल कारा में नहीं करते हैं इस वजह डाक्टर के अनुपस्थित में दो बार बंदी साह को सदर अस्पताल भेजने की बात कारा अधीक्षक ने अपने प्रतिवेदन में बताया है। विदित हो कि बीते जुलाई माह में खड़गपुर के हत्यारोपी मनीष कुमार मंडल ने कारा के छत से कुदकर आत्महत्या कर लिया था। इस मामले में भी जेल प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे थे। बहरहाल, एचआईवी पॉजिटिव कैदी संजय साह की मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। जिसकी निष्पक्ष जांच की मांग परिजन सहित अन्य करने लगे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच हो पाएगी या नहीं? जब 13 जुलाई को न्यायालय में बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कैदी को बेहतर इलाज के लिए भागलपुर भेजने का आवेदन दिया था, तो इतना विलम्ब मेडिकल बोर्ड गठित करने में आखिर किन कारणों से लगा ? मामले की अगर निष्पक्ष जांच हो तो निश्चित रूप से जेल एवं सदर अस्पताल प्रबंधन की गर्दन फंस सकती है। लेकिन ऐसा हो पाएगा ? यह अहम सवाल मुंगेर की फिजाओं में तैर रही है।
