रांची: कभी मेलों और गलियों की रौनक रही रंग-बिरंगी फिरकी आज धीरे-धीरे बच्चों की दुनिया से दूर होती जा रही है। एक समय था, जब दुर्गा पूजा के मेले में फिरकी, लकड़ी की गाड़ी और हाथों से बने पारंपरिक खिलौने बच्चों के आकर्षण का केंद्र होते थे। बच्चे फिरकी लेकर गलियों में दौड़ते और हवा के साथ घूमते उसके रंगीन पंखों को देखकर खुश होते थे। लेकिन समय के साथ बच्चों की पसंद बदली है। मोबाइल, वीडियो गेम और इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के बढ़ते चलन ने पारंपरिक खिलौनों की चमक फीकी कर दी है। इसका असर उन कारीगरों पर भी पड़ रहा है, जिनकी आजीविका इन खिलौनों के निर्माण और बिक्री पर निर्भर है।
साहिबगंज से रांची तक कायम है उम्मीद
पारंपरिक खिलौनों की घटती मांग के बावजूद कारीगरों ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। साहिबगंज से खिलौने बेचने वाले विक्रेता हर साल रांची पहुंचते हैं और मेलों व बाजारों में अपनी दुकानें लगाते हैं। वे आधुनिक खिलौनों के बीच हाथों से तैयार किए गए पारंपरिक खिलौनों को भी लोगों तक पहुंचाने की कोशिश करते हैं।
इन खिलौनों के पीछे वर्षों का अनुभव, मेहनत और पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी जुड़ी है। कागज, बांस और अन्य साधारण सामग्रियों से तैयार होने वाली फिरकी दिखने में भले ही छोटी हो, लेकिन इसके निर्माण में हुनर और धैर्य की जरूरत होती है। कारीगरों के लिए यह केवल बच्चों के खेलने की चीज नहीं, बल्कि उनकी आजीविका और पारंपरिक कला का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
साहिबगंज में आज भी पारंपरिक खिलौने तैयार किए जाते हैं। कारीगर हर साल इन्हें बाजार तक पहुंचाते हैं और उम्मीद करते हैं कि मेले में आने वाले लोग उनके उत्पादों को पसंद करेंगे। हालांकि, बदलती ग्राहक पसंद और आधुनिक खिलौनों की बढ़ती उपलब्धता ने उनके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
चीनी खिलौनों और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से बढ़ी चुनौती
बाजार में आज रंग-बिरंगी रोशनी वाले खिलौने, बैटरी से चलने वाली कारें, रिमोट कंट्रोल गाड़ियां और कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद उपलब्ध हैं। आकर्षक डिजाइन और नए फीचर्स वाले ये खिलौने बच्चों को आसानी से अपनी ओर खींच लेते हैं। वहीं, कम उम्र से ही मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन से जुड़ाव बढ़ने के कारण पारंपरिक खिलौनों के प्रति आकर्षण कम होता जा रहा है।
चीनी खिलौनों की मौजूदगी ने भी इस कारोबार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाई है। आधुनिक डिजाइन और आकर्षक बनावट वाले उत्पादों के बीच साधारण फिरकी के लिए ग्राहकों का ध्यान खींचना मुश्किल हो गया है।
छोटे कारीगरों के पास बड़े पैमाने पर उत्पादन करने और अपने उत्पादों का व्यापक प्रचार करने के पर्याप्त साधन भी नहीं हैं। ऐसे में उनकी मेहनत से तैयार खिलौनों को बाजार में उचित जगह और कीमत मिलना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
मोबाइल की स्क्रीन में सिमटता जा रहा बचपन
फिरकी की घटती लोकप्रियता केवल एक पारंपरिक खिलौने की मांग कम होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह बच्चों के बदलते बचपन की तस्वीर भी पेश करती है। पहले बच्चों के मनोरंजन के लिए महंगे खिलौनों की जरूरत नहीं होती थी। गलियां, खुले मैदान और मेले ही उनके लिए खुशियों की दुनिया हुआ करते थे।
बच्चे फिरकी लेकर दौड़ते, दोस्तों के साथ खेलते और छोटी-छोटी चीजों में आनंद तलाशते थे। इन खेलों में न बैटरी की जरूरत थी और न ही किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की।
आज मनोरंजन के साधन तेजी से मोबाइल स्क्रीन और डिजिटल गेम तक सीमित होते जा रहे हैं। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स ने मनोरंजन के नए विकल्प जरूर दिए हैं, लेकिन पारंपरिक खेलों से बच्चों का जुड़ाव कम हुआ है। शहरीकरण और खुले स्थानों की कमी ने भी गलियों और मैदानों में खेले जाने वाले पारंपरिक खेलों को प्रभावित किया है।
सादगी ही फिरकी की सबसे बड़ी पहचान
फिरकी की खासियत उसकी सादगी है। इसे चलाने के लिए न बिजली चाहिए, न बैटरी और न ही किसी तकनीकी सुविधा की जरूरत होती है। हवा के साथ घूमते इसके रंगीन पंख बच्चों को प्रकृति के करीब लाते हैं। यही विशेषता इसे आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों से अलग पहचान देती है।
इसके निर्माण और बिक्री से जुड़े लोगों के लिए हर बिकने वाली फिरकी उनकी मेहनत और हुनर का सम्मान है। लेकिन जब बाजार में इसकी मांग कम होती है, तो इसका सीधा असर उनकी कमाई पर पड़ता है।
साहिबगंज से रांची आने वाले विक्रेता आज भी इसी उम्मीद के साथ मेलों में दुकान लगाते हैं कि लोग पारंपरिक खिलौनों को पसंद करेंगे। उनके सामने चुनौती सिर्फ बिक्री बढ़ाने की नहीं, बल्कि उस कला और परंपरा को जीवित रखने की भी है, जो आधुनिक बाजार की प्रतिस्पर्धा में पीछे छूटती जा रही है।
पारंपरिक खिलौनों को बचाने की जरूरत
बदलते समय के साथ आधुनिक खिलौनों और तकनीक का आना स्वाभाविक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पारंपरिक खिलौनों को पूरी तरह भुला दिया जाए। स्थानीय मेलों, बाजारों और सांस्कृतिक आयोजनों में ऐसे खिलौनों को जगह देकर कारीगरों की मदद की जा सकती है। अभिभावक भी बच्चों को पारंपरिक खिलौनों से परिचित कराकर उन्हें अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ सकते हैं।
कभी हवा के साथ घूमती फिरकी बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाती थी। आज जरूरत है कि इस छोटी-सी फिरकी के साथ जुड़ी बचपन की यादों, पारंपरिक कारीगरी और कारीगरों की आजीविका को भी बचाया जाए।
