नई दिल्ली: चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने या जरूरी तथ्यों को छिपाने वाले जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई चुना हुआ उम्मीदवार अपने चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देता है या अनिवार्य तथ्यों को छिपाता है, तो उसके खिलाफ आम नागरिक भी आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है। ऐसे मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 195 की पाबंदियां शिकायत दर्ज कराने के रास्ते में बाधा नहीं बनेंगी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People Act) की धारा 125-A के तहत कथित अपराध के मामले में निजी शिकायत दर्ज कराने के लिए CrPC की धारा 195 के तहत निर्धारित विशेष शर्तों का पालन करना जरूरी नहीं है।
चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने पर कार्रवाई संभव
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए नामांकन पत्र और चुनावी हलफनामे में सही जानकारी देना अनिवार्य है। यदि कोई उम्मीदवार गलत जानकारी देता है, महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाता है या जरूरी विवरण देने में विफल रहता है, तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125-A ऐसे मामलों में दंड का प्रावधान करती है। शीर्ष अदालत के फैसले से इस प्रावधान के तहत आम नागरिकों की ओर से शिकायत दर्ज कराने का कानूनी रास्ता स्पष्ट हुआ है।
CrPC की धारा 195 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
CrPC की धारा 195 कुछ विशेष अपराधों के मामलों में अदालतों द्वारा संज्ञान लेने पर प्रतिबंध लगाती है। ऐसे मामलों में संबंधित अदालत या अधिकृत सरकारी अधिकारी की लिखित शिकायत जरूरी हो सकती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125-A के तहत अपराध का आरोप लगाने वाली निजी शिकायत पर यह पाबंदी लागू नहीं होती। इसलिए केवल इस आधार पर किसी नागरिक की शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसे किसी सरकारी अधिकारी ने दर्ज नहीं कराया है।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी निर्वाचित उम्मीदवार को परेशान करने के उद्देश्य से झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत दर्ज कराई जाती है, तो मजिस्ट्रेट मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार उचित आदेश दे सकते हैं।
चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों पर भी अदालत की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग अपने अधिकार क्षेत्र में महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है, लेकिन कानूनों की व्याख्या करना मुख्य रूप से न्यायपालिका का काम है। आयोग की ओर से जारी दिशानिर्देश या प्रेस नोट अदालत को कानून की किसी खास व्याख्या को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं करते।
अदालत की यह टिप्पणी चुनावी हलफनामों से जुड़े कानूनी प्रावधानों की व्याख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
कर्नाटक के विधायक से जुड़े मामले में आया फैसला
यह फैसला राजकुमार मदकी की ओर से दायर अपील पर सुनाया गया। मामला कर्नाटक के बीदर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित विधायक शैलेंद्र बेलदाले से जुड़ा था।
राजकुमार मदकी ने आरोप लगाया था कि बेलदाले ने 2023 के विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र के साथ दाखिल हलफनामे में अपने आवासीय पते के संबंध में गलत जानकारी दी थी। इस संबंध में उन्होंने बेंगलुरु के अतिरिक्त मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट के समक्ष CrPC की धारा 200 के तहत निजी आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी।
शिकायत में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125-A के तहत कार्रवाई की मांग की गई थी। हालांकि, कर्नाटक हाई कोर्ट ने 7 मार्च 2025 को विधायक के खिलाफ शिकायत खारिज कर दी थी। इसके बाद राजकुमार मदकी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
2002 और 2006 के कानूनी संशोधनों का दिया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और CrPC में हुए संशोधनों का भी उल्लेख किया। पीठ ने ध्यान दिलाया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में धारा 125-A को 24 अगस्त 2002 से जोड़ा गया था, जबकि CrPC की धारा 195 में इसके बाद अप्रैल 2006 में संशोधन हुआ।
अदालत के अनुसार, विधायिका को इन दोनों प्रावधानों की जानकारी थी। इसके बावजूद CrPC की धारा 195 में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125-A को शामिल नहीं किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि धारा 125-A के तहत कथित अपराध के मामलों में निजी शिकायत दर्ज कराने पर धारा 195 की पाबंदी लगाने का इरादा नहीं था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित मामले में ट्रायल मजिस्ट्रेट के समक्ष चल रही कार्यवाही को बंद करने के हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन इसके पीछे हाई कोर्ट द्वारा दिए गए कानूनी तर्कों को स्वीकार नहीं किया।
इस फैसले से चुनावी हलफनामों में गलत जानकारी देने के आरोपों पर आम नागरिकों की ओर से शिकायत दर्ज कराने की कानूनी स्थिति स्पष्ट हुई है। साथ ही, यह भी रेखांकित हुआ है कि ऐसी शिकायतों पर कार्रवाई करते समय संबंधित अदालत तथ्यों और कानून के आधार पर निर्णय लेगी।
