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200 साल का रहस्य सुलझा: रोहतासगढ़ किले के संस्कृत शिलालेख ने खोला 1607 का राज

200 साल का रहस्य सुलझा: रोहतासगढ़ किले के संस्कृत शिलालेख ने खोला 1607 का राज

सासाराम (रोहतास)। रोहतासगढ़ किले के कठौतिया घाट पर स्थित दो सदियों से अधिक पुराने संस्कृत शिलालेख को आखिरकार इतिहासकार डॉ. श्याम सुंदर तिवारी ने पढ़ लिया है। सात वर्षों की अथक मेहनत के बाद यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई है, जिससे मुगल कालीन इतिहास की एक महत्वपूर्ण परत उजागर हुई है।

मुख्य बिंदु 

  • दो सदी से अधिक पुराना रोहतासगढ़ शिलालेख आखिरकार पढ़ा गया
  • इतिहासकार डॉ. श्याम सुंदर तिवारी ने वर्षों के प्रयास से सफलता पाई
  • यह शिलालेख राजा मान सिंह की 1607 की किलेबंदी का महत्वपूर्ण विवरण देता है
  • जहांगीर के शासनकाल में भी शिलालेख में उनका नाम अनुपस्थित
  • पहला उल्लेख 1812 में फ्रांसिस बुकानन ने किया था

वर्षों की कोशिशों को मिली कामयाबी

कठौतिया घाट दरवाजे के ऊपर करीब 20 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस दुर्लभ शिलालेख का अधिकांश हिस्सा टूट चुका है और इसके अक्षर बेहद छोटे हैं। यही कारण था कि करीब दो सौ साल से अधिक समय से अनेक दिग्गज इतिहासकारों और ब्रिटिश सर्वेक्षकों के प्रयास के बावजूद इसका मूल पाठ कभी दर्ज नहीं हो सका।

इसका पहला उल्लेख अंग्रेज सर्वेयर फ्रांसिस बुकानन ने 1812 में अपनी डायरी में किया था। इसके बाद 1838 में मार्टिन की रिपोर्ट, 1876 में इतिहासकार राजेंद्र लाल मित्र व 1896 में प्रो. किल्हौर्न के शोध में भी इस शिलालेख का कोई स्पष्ट पाठ सामने नहीं आ सका। यहां तक कि वर्ष 1901-02 में एएसआई के डॉ. थियोडोर ब्लोच व 1929 में मौलवी मो. हामिद कुरैशी ने भी इस स्थल का सर्वेक्षण किया था, लेकिन सीढ़ी की अनुपलब्धता व शिलालेख के क्षतिग्रस्त होने के कारण वे इसे पढ़ने में असफल रहे थे।

क्या है शिलालेख में?

यह शिलालेख रोहतासगढ़ की किलेबंदी को लेकर कठौतिया घाट के निर्माण से संबंधित है, कि इस किलेबंदी का निर्माण राजा मान सिंह ने इस तिथि को कराया है। इसकी पहली किलेबंदी लाल दरवाजा पर थी। दूसरी किलेबंदी में लाल दरवाजा पर छोटी पहाड़ी को गुलेरिया खोह, जहां बहुत गहरी खाई है, को बांधने का प्रयास किया गया है।

दूसरी तरफ भी खाई है, जहां लगभग 100 मीटर का स्थल डमरू मध्य है। उसे कठौतिया घाट कहते हैं, जो रोहतासगढ़ पहुंचने का सबसे सुगम मार्ग है। इसे देखते हुए प्राचीन काल से वहां किलेबंदी कराई जाती रही है, जो ध्वस्त हो गई थी।

इसके बाद राजा मान सिंह ने जो किलेबंदी कराई, उसे मिट्टी व पत्थरों को रखकर मजबूत पहाड़ी की तरह खड़ा किया गया, ताकि कोई भी इस रास्ते से बिना अनुमति के रोहतासगढ़ में प्रवेश न कर सके। साथ ही वहां एक दरवाजा बनाया गया और उसपर यह शिलालेख लिखवाया गया।

जहांगीर के शासनकाल में भी उनका नाम अनुपस्थित

डॉ. तिवारी के अनुसार शिलालेख की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय यहां मुगल शासक जहांगीर का शासनकाल था। इसके बावजूद 1607 के इस शिलालेख में जहांगीर का नाम नहीं दिया गया है, केवल राजा मानसिंह का ही नाम है। जबकि हथियापोल में जो बादशाह अकबर के शासनकाल का है, उसमें अकबर का नाम है।

इस नए शिलालेख के पढ़े जाने से जहांगीर के शासनकाल में इस क्षेत्र की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को समझने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है।

पतझड़ की तस्वीर और आधुनिक तकनीक से खुला राज

डॉ. तिवारी के अनुसार वे लंबे समय से इस शिलालेख को पढ़ने की कोशिश में जुटे थे। रोहतासगढ़ के जंगलों और पेड़-पौधों की घनी पत्तियों के कारण इसकी स्पष्ट तस्वीर नहीं मिल पाती थी। 2019 में पतझड़ के दौरान उन्हें संयोग से इसकी एक साफ फोटो मिली। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग कोणों से ली गई तस्वीरों का गहन डिजिटल अध्ययन किया।

इसके बावजूद टूटे हुए पत्थर व क्षतिग्रस्त हो चुके अक्षरों को समझने के लिए वहां जा-जाकर कई बार फोटो लेना पड़ा, जिसमें काफी समय लगा। बीच-बीच के गायब कुछ अक्षरों को व्याकरण से मिलाकर व तात्कालिक परिस्थितियों के हिसाब से पढ़ने की कोशिश हुई। इस दौरान आचार्य पं. राम अवधेश चतुर्वेदी समेत कुछ अन्य विशेषज्ञों की भी मदद ली गई और अंततः सात वर्षों के प्रयास के बाद इस ऐतिहासिक पाठ को डिकोड कर लिया गया।

रोहतासगढ़ किले का ऐतिहासिक महत्व

रोहतासगढ़ किला भारत ही नहीं, पूरे विश्व के विशालतम किलों में से एक है, जो 26 मील की परिधि में फैला हुआ है। सतयुगी सूर्यवंशी राजा सत्यहरिश्चंद्र के पुत्र रोहिताश्व द्वारा स्थापित रोहतासगढ़ के नाम पर इस क्षेत्र का नामकरण रोहतास किया गया।

प्राचीन समय से ही रोहतास पहाड़ी पर जाने के लिए चारों दिशाओं में केवल चार मार्ग रहे हैं, जिन्हें घाट कहा जाता है। ये हैं—पूरब में मेंडारा (मेढ़ा) घाट, पश्चिम में कठौतिया घाट, उत्तर में घोड़ा घाट और दक्षिण में राजघाट।

किले में कुल 83 दरवाजे हैं, जिनमें ये चार प्रमुख हैं। रोहतासगढ़ में रोहितासन या चौरासन सीढ़ी मंदिर, पार्वती मंदिर, कठौतिया घाट, सिंह दरवाजा, लाल दरवाजा, गाजी दरवाजा, राजभवन या महल सराय, किलेदार महल, पंच महल, हथियापोल, फूल महल, बारादरी, राजा का महल तथा तख्तपादशाही, खानबाग और जनाना महल, रानी का महल, नाच घर, शेरशाही मस्जिद, हब्स खां का मकबरा, हब्स खां की मस्जिद और मदरसा, गणेश मंदिर, शाकी सुल्तान का मकबरा आदि दर्शनीय हैं।

मुगल काल में राजा मान सिंह को बंगाल और बिहार का वायसराय नियुक्त किए जाने पर उन्होंने रोहतास को अपना गढ़ चुना। उन्होंने किले की किलेबंदी को पूरी तरह से मरम्मत कराया, जलाशयों को गहरा और मरम्मत कराया, अपने निवास के लिए एक महल बनवाया और फारसी शैली में एक सुंदर बगीचा लगवाया।

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