आदिवासी एक्सप्रेस/विजय कुमार यादव
रमकंडा,गढ़वा। प्रखंड के हरहे एवं सुली गांव में पेयजल संकट लगातार गहराता जा रहा है।क्षेत्र में नागरिकों को पर्याप्त एवं निर्बाध पेयजल उपलब्ध कराने की व्यवस्था कागजों तक सीमित नजर आ रही है।कई स्थानों पर करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित जलापूर्ति योजनाएं वर्षों से बंद पड़ी हैं,जिससे ग्रामीणों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।सुली गांव के गोरयाक्रम ऊपरी टोला में विधायक मद से निर्मित जलमीनार आज तक ग्रामीणों को एक बूंद पानी भी उपलब्ध नहीं करा सका है।यहां रहने वाले आदिम जनजाति परिवार आज भी पेयजल के लिए नाले और कुओं पर निर्भर हैं।ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार विधायक प्रतिनिधि एवं संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी दी।शिकायत के बाद जलमीनार को दोबारा चालू करने का प्रयास भी किया गया,लेकिन आज तक इससे नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी।इसी प्रकार हरहे गांव के पश्चिमी टोला में हाठू नदी पुल के समीप लगभग 30 परिवार वर्षों से कुएं के पानी पर निर्भर हैं।ग्रामीणों का आरोप है कि जनप्रतिनिधि और प्रशासन समस्या से अवगत होने के बावजूद इसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।जहां संपन्न लोगों ने अपने घरों में बोरिंग की व्यवस्था कर ली है,वहीं गरीब परिवार शैवालयुक्त एवं प्रदूषण की आशंका वाले कुएं का पानी पीने को मजबूर हैं।भीषण गर्मी और बढ़ती जल आवश्यकता के बीच ग्रामीणों ने प्रशासन,पेयजल एवं स्वच्छता विभाग तथा जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि खराब पड़ी जलापूर्ति योजनाओं को अविलंब दुरुस्त कराया जाए तथा जहां पेयजल संकट की स्थिति बनी हुई है वहां वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।ग्रामीणों का कहना है कि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में होना चाहिए, ताकि लोगों को मूलभूत सुविधा के लिए संघर्ष न करना पड़े।
