-कंबल वाले बाबा का शिविर खत्म, कर्पूरी मैदान में कचरे का अंबार; दवा बिक्री और सफाई पर उठे सवाल
-हुसैनाबाद में आठ दिवसीय शिविर के बाद सार्वजनिक स्थल की सफाई, दवा बिक्री की जांच और प्रशासनिक अनुमति की शर्तों को लेकर जवाबदेही की मांग
-आदिवासी एक्सप्रेस संवाददाता
हुसैनाबाद,पलामू 1 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक काली कंबल वाले बाबा गणेश यादव का शिविर समाप्त होने के बाद भी सवालों के घेरे में है। सबसे बड़ी बहस इस बात की है कि इस कार्यक्रम को प्रशासनिक स्वीकृति हुसैनाबाद अनुमंडल पदाधिकारी समीर अल्फ्रेड मुर्मू द्वारा दी गई थी।गौरतलब है कि कार्यक्रम स्थल के पास एसडीएम और डीएसपी आवास भी हैं और महज 100 मीटर की परिधि में अनुमंडलीय अस्पताल भी है। इसके बाद भी सेवा सप्ताह के तहत निःशुल्क शिविर में लाखों-करोड़ों रुपये की दवाओं की बिक्री की गई। यह बात जनता को जानने का हक है कि आखिर बाबा की महंगी औषधि भारत सरकार की किस लेबोरेटरी की मानक दक्षता को फुलफिल करते हुए बेची गई, लेकिन अधिकारियों की दोहरी नीति ने इसका खुलेआम समर्थन किया। दवा दुकानों में छापेमारी और खुले मैदान में दवा बेचने की खुली छूट!
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि कार्यक्रम समापन के बाद पूरे मैदान क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि एसडीएम और डीएसपी आवास व माता तारा शक्ति मंदिर परिसर में फैले कचरे के अंबार की सफाई कौन और कब करेगा। अगले दिन से नवरात्रि जैसा पावन पर्व है, जिसमें हजारों महिलाएं-पुरुष मंदिर में पूजा करने जाएंगे, क्या उन्हें कचरे के ढेर से होकर ही जाना पड़ेगा? क्या यह निःशुल्क शिविर के नाम पर सरकारी व सार्वजनिक संपत्ति का दोहन नहीं है? शहर के बीच यह एक प्रसिद्ध मैदान है, जहां हर दिन सैकड़ों की संख्या में लोग सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक करते हैं, लेकिन कचरे के अंबार और खुले में शौच की गंदगी से मैदान की तरफ जाना दूभर हो गया है। अब लोग यही कह रहे हैं कि लाचार व बेबस लोगों से चमत्कार के नाम पर लगाए गये शिविर से तो सबने कमाई की है, लेकिन अब सफाई कौन करेगा, इसी का इंतजार यह मैदान कर रहा है।
सवालों के घेरे में भाजपा का सेवा संकल्प सप्ताह ।
प्रशासनिक आदेश में भाजपा नगर मंडल अध्यक्ष अजय प्रसाद गुप्ता द्वारा निःशुल्क शिविर के नाम पर कई मानक बिंदुओं का अनुपालन करते हुए कार्यक्रम कराने की स्वीकृति दी गई थी। लेकिन कंबल वाले बाबा का चमत्कार महज एक दिन के अंदर व्यापार में तब्दील हो गया और बड़ी-बड़ी गाड़ियों से उनके द्वारा ब्रांडिंग की हुई दवा की बिक्री की गई। एक तरफ बाबा द्वारा घोषणा की गई कि दवा लेना अनिवार्य नहीं है, चमत्कार सिर्फ कंबल में है, जिसमें माता काली की असीम कृपा है। लेकिन दूसरी तरफ यह बात भी झूठी साबित हुई ,जब बाबा अपनी दवा का खुले मंच से प्रचार-प्रसार करते हुए दिखे और उन्होंने यह बात स्वीकार की कि दवा भी जरूरी है।
इसके बाद बेकाबू भीड़ को भांपते हुए बड़े नेताओं की राजनीतिक मार्केटिंग भी चालू हो गई और मंच से पूर्व विधायक व मंत्री श्री कमलेश कुमार सिंह द्वारा इस कार्यक्रम को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के सेवा पखवाड़ा शिविर का नाम दे दिया गया। हालांकि इन बातों में कितनी सच्चाई है, वह वे ही जानते हैं, लेकिन प्रदेश भाजपा और जिला इकाई द्वारा पार्टी की ओर से आधिकारिक रूप से कोई घोषणा नहीं की गई थी। लेकिन सवाल यह है कि भारत के प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान को लेकर देश भर के लोगों से झाड़ू उठवाते हैं, वे खुद सफाई के प्रति सजग रहते हैं, स्वच्छता को लेकर मिशन अभियान चलाते हैं। किंतु प्रधानमंत्री के नाम पर अपनी दवा का मार्केटिंग करना और गंदगी का अंबार लगाना क्या आयोजन मंडल को सवालों के कठघरे में खड़ा नहीं करता है?
क्या कहते हैं नगर कार्यपालक पदाधिकारी?
कंबल वाले बाबा के आरोग्य शिविर से फैली गंदगी की सफाई पर जब कार्यपालक पदाधिकारी से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम के संबंध में मुझे सिर्फ अनुमंडल पदाधिकारी के कार्यालय आदेश पर कार्यक्रम दंडाधिकारी के रूप में प्रतिनियुक्त किया गया था। लेकिन नगर की प्रशासकीय व्यवस्था से संबंधित हमसे कोई अनुमति नहीं ली गई है। सफाई की जिम्मेदारी नियमानुसार नगरपालिका अधिनियम, 2011 में वर्णित कंडिका के अनुसार कार्यक्रम कराने वाली संस्था या व्यक्ति की है, नहीं तो उसका निर्धारित शुल्क भुगतान करने के बाद ही सफाई व अन्य व्यवस्था दी जाएगी।
यह भी बड़ा सवाल – कंबल वाले चमत्कारी बाबा से किसको फायदा हुआ और किसको नुकसान, इसे लेकर कार्यक्रम के समापन के बाद सोशल मीडिया पर अलग तरह की बहस छिड़ी हुई है। कुछ गोदी मीडिया की रिपोर्ट की बात करें तो उनका दावा है कि कुछ दूर-दराज के पीड़ित मरीजों ने कहा कि बाबा के कंबल से हमें फायदा हुआ है। कुछ लोगों ने तो दावा किया कि किसी को फायदा हुआ या नहीं, बाबा के शिविर में बिहार, झारखंड, यूपी समेत कई राज्यों से आए लाचार, पीड़ित व दिव्यांग मरीज लाखों की संख्या में आए, जिससे जपला में टेंपो चालक, ठेला, खोमचा, होटल व अन्य खाने-पीने व रहने की व्यवस्था से अर्थव्यवस्था एकाएक बढ़ गई।जबकि स्वतंत्र मीडिया का मानना है कि कमाई तो टेंपो व दुकानों से ज्यादा बाबा की ब्रांडिंग वाली दवा से हुई, जो पैसा लेकर रफूचक्कर हो गए। लेकिन पत्रकारिता धर्म क्या कहता है? उन पीड़ित, लाचार, बेबस, दिव्यांग लोगों के बारे में जो संसाधनों व पैसे के अभाव में महंगी चिकित्सा व्यवस्था से थक-हार कर, जब सब जगह से निराश होने के बाद आशा की उम्मीद लेकर इलाज के नाम पर आए, उन्हें महंगी जेनरिक दवा परोसी गई। उन्हें पुनः आस्था के नाम पर चमत्कार दिखाकर उनका आर्थिक शोषण किया गया! उनकी आत्मा क्या कहती होगी? वह यहां के आयोजक को क्या कहता होगा? आखिर उसकी आखिरी उम्मीद स्वतंत्र पत्रकार ही तो है, जो उसकी बात को सरकार तक पहुंचा सके।बहरहाल, आस्था के नाम पर फैलाये गए अंधविश्वास पर अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन बीमार लाचार लोगों को जो आर्थिक क्षति हुई है, उसे नकारा नहीं जा सकता। एक व्यक्ति विशेष के दवा कारोबार में पुलिस-प्रशासन की ड्यूटी बढ़ी, कई लोग अलग-अलग सड़क दुर्घटनाओं में घायल हुए। आखिर इस निःशुल्क आरोग्य शिविर के आयोजन सह कारोबार मेला से आम जनता को क्या फायदा हुआ? इसकी पड़ताल होनी चाहिए।
