
रांची: राजधानी रांची के डोरंडा स्थित जैप-1 परिसर में महानवमी के अवसर पर गोरखा बटालियन ने अपनी 146 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हुए शस्त्र पूजा की। इस दौरान जवानों ने पारंपरिक खुखरी, राइफल और इंसास की पूजा-अर्चना कर मां दुर्गा से अपनी सुरक्षा और कर्तव्य पालन में सफलता की कामना की। हथियारों को फूल-माला चढ़ाकर तिलक लगाया गया और सलामी देने की परंपरा भी निभाई गई।
खुखरी, राइफल और इंसास की विधि-विधान से पूजा
महानवमी के अवसर पर जैप-1 परिसर में गोरखा बटालियन के जवानों ने अपने अस्त्र-शस्त्रों को साफ-सुथरा कर कतार में सजाया। इसके बाद हथियारों पर फूल-माला चढ़ाई गई और तिलक लगाकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। इस धार्मिक आयोजन में जैप-1 के कमांडेंट सह रांची के एसएसपी राकेश रंजन भी शामिल हुए।
शस्त्र पूजा के दौरान जवानों ने मां भवानी से प्रार्थना की कि वे ड्यूटी के दौरान सुरक्षित रहें और देश, राज्य तथा समाज की रक्षा करने में पूरी निष्ठा के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें।
नौ कन्या पूजन और हवन के साथ संपन्न हुई पूजा
महानवमी पर नौ दिनों से चल रही पूजा-अर्चना का समापन पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुआ। सबसे पहले नौ कन्याओं का पूजन किया गया। इसके बाद हवन कर मां दुर्गा से सुख, शांति और समृद्धि की कामना की गई। बटालियन की परंपरा के अनुसार, विभिन्न कंपनियों की ओर से बलि अर्पित करने की रस्म भी निभाई गई।
पूरे परिसर में धार्मिक आस्था और उत्साह का माहौल रहा। जवानों के परिवारों की महिलाओं ने भी पूजा में हिस्सा लिया और मां दुर्गा से अपने परिवारों की खुशहाली की प्रार्थना की।
जवानों के लिए क्यों खास है शस्त्र पूजा?
गोरखा बटालियन में शस्त्र पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जवानों के कर्तव्य, अनुशासन और सुरक्षा से जुड़ी परंपरा है। जवानों की मान्यता है कि हथियार उनके कर्तव्य का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए महानवमी के दिन शस्त्रों की पूजा कर मां दुर्गा से प्रार्थना की जाती है कि वे हर चुनौती का सामना करने की शक्ति प्रदान करें।
राज्य के अलग-अलग हिस्सों में तैनात पुलिसकर्मी कानून-व्यवस्था बनाए रखने और आम लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाते हैं। ऐसे में यह आयोजन जवानों के मनोबल, आस्था और कर्तव्य के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

प्रतिमा नहीं, कलश में मां दुर्गा का आह्वान
जैप-1 परिसर में गोरखा बटालियन की दुर्गा पूजा की एक खास विशेषता यह है कि यहां मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने के बजाय कलश को देवी का स्वरूप मानकर पूजा-अर्चना की जाती है। बटालियन में यह परंपरा वर्ष 1880 से चली आ रही है। वर्ष 2026 में इस परंपरा को 146 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
कलश स्थापना के साथ शुरू होने वाले नौ दिवसीय अनुष्ठान में जवानों के साथ उनके परिवार के सदस्य भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। परिवार की महिलाओं के लिए यह पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ने का अवसर भी है।
जवानों और उनके परिवारों की सुख-समृद्धि की कामना
महानवमी पर आयोजित शस्त्र पूजा में जवानों और अधिकारियों की सुरक्षा के साथ उनके परिवारों के सुखमय जीवन की कामना की गई। नौ दिनों तक सुबह-शाम पूजा-पाठ और मां दुर्गा की आराधना से परिसर भक्तिमय बना रहा।
गोरखा बटालियन की यह परंपरा धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और अनुशासन का अनूठा संगम है। करीब डेढ़ सदी से अधिक समय से चली आ रही इस परंपरा में जवान हर वर्ष मां भवानी के समक्ष शीश झुकाकर आशीर्वाद मांगते हैं, ताकि वे साहस, निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें।
