-विकास के दावों की खुली पोल, घंघरी-दंतार सड़क भी बदहाल
आदिवासी एक्सप्रेस / संतोष कुमार दास
चतरा : कंधे पर स्कूल बैग और सामने रसरसी नदी का पानी। पुल नहीं होने के कारण हंटरगंज प्रखंड के दंतार इलाके के स्कूली बच्चे बरसात में जान जोखिम में डालकर नदी पार कर स्कूल जाने को मजबूर हैं। नदी का जलस्तर बढ़ते ही बच्चों के साथ अभिभावकों की चिंता भी बढ़ जाती है।घंघरी से दंतार तक जाने वाली सड़क भी जगह-जगह गड्ढों में तब्दील है। इस मार्ग से दंतार, कसियाडीह, मांझगवा, बनियाबांध, लेढ़ो, कुसुम्भा, तेलियाउना, जोलडीहा, राजगुरु, कुरखेता, पंडरकोला, बघमारी समेत दर्जनों गांवों के ग्रामीण आवागमन करते हैं। बारिश में बदहाल सड़क और रसरसी नदी ग्रामीणों के लिए दोहरी परेशानी बन जाती है।ग्रामीणों के अनुसार, बारिश के दिनों में रसरसी नदी का जलस्तर बढ़ने पर बच्चों का स्कूल पहुंचना मुश्किल हो जाता है। कई बच्चे स्कूल बैग लेकर पानी के बीच से नदी पार करते हैं। पानी अधिक बढ़ने पर आवागमन पूरी तरह बाधित हो जाता है। कई बार बच्चों को नदी के दूसरी ओर पानी कम होने का इंतजार करना पड़ता है। इससे उनकी पढ़ाई भी प्रभावित होती है।नदी पार करते स्कूली बच्चों की तस्वीरें क्षेत्र की जमीनी हकीकत बयां कर रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या कोई नई नहीं है। हर साल बरसात में यही स्थिति बनती है। बच्चों को नदी पार करते देख अभिभावक सहमे रहते हैं। उन्हें डर रहता है कि कहीं पैर फिसलने या तेज बहाव की चपेट में आने से कोई बड़ा हादसा न हो जाए।
टेंडर हुआ, वन विभाग की मंजूरी में अटका पुल
ग्रामीणों के अनुसार, रसरसी नदी पर पुल निर्माण के लिए टेंडर हो चुका है। इसके बावजूद वन विभाग की मंजूरी नहीं मिलने के कारण निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब पुल की जरूरत लंबे समय से है और टेंडर प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है, तो विभागीय अड़चन कब दूर होगी और निर्माण कार्य कब शुरू होगा।
शिकायतों के बाद भी नहीं बदली तस्वीर
ग्रामीणों का दावा है कि पुल और सड़क की समस्या को लेकर स्थानीय सांसद और विधायक से कई बार लिखित शिकायत की गई है। इसके बावजूद अब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। इससे ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ रही है।ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय सड़क, पुल और विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन बरसात में बच्चों को नदी पार करते देख उन दावों की जमीनी हकीकत सामने आ जाती है। ग्रामीण अब आश्वासन नहीं, बल्कि धरातल पर काम चाहते हैं।
