गिरिडीह। आज के आधुनिक युग में जहाँ दहेज एक सामाजिक अभिशाप बना हुआ है, वहीं गिरिडीह जिले से मानवता और आदर्शवाद की एक खूबसूरत तस्वीर सामने आई है। ग्राम गुमगी निवासी महेंद्र यादव और उनके पुत्र रमेश यादव ने सदियों से चली आ रही दहेज प्रथा को ठुकरा कर समाज को एक नई दिशा दी है। सादा समारोह, ऊंचे विचार रमेश यादव का विवाह ग्राम हाड़हाडा निवासी तुलसी यादव की सुपुत्री प्रीति यादव के साथ सोमवार, 20 अप्रैल को डोरंडा मंदिर में संपन्न हुआ। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुए इस विवाह में किसी भी प्रकार के लेन-देन या दहेज को स्थान नहीं दिया गया। परिवार ने फिजूलखर्ची के बजाय सादगी और संस्कारों को प्राथमिकता दी।
बहू लक्ष्मी है, दहेज नहीं
दूल्हे के पिता महेंद्र यादव ने भावुक होते हुए एक कड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि हमारी बहू हमारे घर की लक्ष्मी है। हमें किसी संपत्ति या धन की लालसा नहीं है, हमें बस बेटी का साथ और उसका आशीर्वाद चाहिए। बेटी खुद में एक अनमोल रत्न है।
क्षेत्र में चहुंओर प्रशंसा
विवाह से पूर्व 19 अप्रैल को हल्दी और मेहंदी की रस्में पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ पूरी की गईं, जिसमें ग्रामीणों और शुभचिंतकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस साहसी और प्रेरक पहल की पूरे गिरिडीह क्षेत्र में चर्चा हो रही है। बुद्धिजीवियों और ग्रामीणों का मानना है कि यदि हर परिवार महेंद्र यादव जैसा संकल्प ले, तो समाज से दहेज रूपी कुप्रथा का समूल नाश हो सकता है।
एक मजबूत सामाजिक संदेश
यह विवाह केवल दो परिवारों का मिलन नहीं, बल्कि उन कुरीतियों के खिलाफ एक मौन क्रांति है जो बेटियों के सम्मान को कमतर आंकती हैं। दहेज मुक्त विवाह की यह पहल आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मार्गदर्शक का कार्य करेगी।
