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बंद खदानें बनीं काल: शिकारीपाड़ा में डूबे युवक का पांचवें दिन भी नहीं मिला सुराग, एनडीआरएफ भी नाकाम।

बंद खदानें बनीं काल: शिकारीपाड़ा में डूबे युवक का पांचवें दिन भी नहीं मिला सुराग, एनडीआरएफ भी नाकाम।

कर्माचूआ का 15 वर्षीय सुखदेव शुक्रवार से है लापता, मां के साथ आया था नानी घर।

  • दो सप्ताह पहले भी डूबा था एक बच्चा, सातवें दिन पानी में तैरता मिला था शव।

शिकारीपाड़ा/दुमका/

आदिवासी एक्सप्रेस।

दुमका जिले के पत्थर औद्योगिक क्षेत्र शिकारीपाड़ा में बंद पड़ी पत्थर खदानें अब मासूमों और युवाओं के लिए ‘डेथ ट्रैप’ (मौत का कुआं) साबित हो रही हैं। इन खदानों में डूबकर मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला बीते शुक्रवार का है, जहां कादर पोखर मौजा स्थित एक बंद खदान में डूबे 15 वर्षीय युवक का पांच दिन बाद भी कोई सुराग नहीं मिल पाया है। मंगलवार को बिहार (पटना) से बुलाई गई एनडीआरएफ (NDRF) की टीम भी काफी मशक्कत के बाद युवक के शव को बाहर निकालने में असफल रही।

दातून करने के दौरान आया मिर्गी का दौरा

मिली जानकारी के अनुसार, शिकारीपाड़ा प्रखंड के कर्माचूआ गांव निवासी सुखदेव डेहरी (15 वर्ष) अपनी मां के साथ नानी के घर गमार पहाड़ी आया हुआ था। बीते शुक्रवार की शाम वह दातून लेकर समीप के कादर पोखर मौजा स्थित एक बंद पत्थर खदान के किनारे बैठा था। परिजनों के मुताबिक, सुखदेव को मिर्गी की बीमारी थी। दातून करने के दौरान अचानक उसे मिर्गी का दौरा आया और वह अनियंत्रित होकर खदान के गहरे पानी में गिर गया।

ग्रामीणों के प्रयास विफल, प्रशासन ने बुलाई NDRF

घटना के तुरंत बाद स्थानीय ग्रामीणों ने अपने स्तर से युवक को निकालने का काफी प्रयास किया, लेकिन गहराई अधिक होने के कारण सफलता नहीं मिली। जब थक-हारकर शव नहीं निकाला जा सका, तो परेशान परिजनों और ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से गुहार लगाई। प्रशासन की पहल पर मंगलवार को पटना से एनडीआरएफ की विशेष टीम बुलाई गई, लेकिन खदान के अथाह पानी में घंटों सर्च ऑपरेशन चलाने के बाद भी टीम खाली हाथ रही।

खनन विभाग और खदान मालिकों की लापरवाही से जा रही जान

स्थानीय लोगों में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि लीज समाप्त होने के बाद पत्थर खदानों को बिना सुरक्षित किए ही छोड़ दिया जाता है। नियमों के मुताबिक, खनन विभाग को निर्धारित मापदंडों (फेंसिंग, डेंजर साइन आदि) का पालन करवाते हुए ही खदानों का सरेंडर लेना चाहिए। ग्रामीणों ने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि इस लापरवाही के लिए जितने दोषी खदान मालिक हैं, उससे कहीं ज्यादा खनन विभाग है, जो नियमों की अनदेखी कर क्षेत्राधिकार का समर्पण ले लेता है।

दो हफ्ते पहले भी हुई थी ऐसी ही त्रासदी

शिकारीपाड़ा थाना क्षेत्र में यह कोई पहली घटना नहीं है। ठीक दो सप्ताह पूर्व इसी थाना क्षेत्र के चित्रा गड़िया मौजा स्थित एक अन्य बंद पत्थर खदान में भी डूबने से एक बच्चे की मौत हो गई थी। उस वक्त भी एनडीआरएफ की टीम शव को खोजने में नाकाम रही थी। आखिरकार, हादसे के सातवें दिन उस बच्चे का शव स्वतः ही पानी के ऊपर तैरता हुआ मिला था। बार-बार हो रहे इन हादसों से साफ है कि प्रशासन और खनन विभाग की लापरवाही स्थानीय लोगों की जान पर भारी पड़ रही है।

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