राजेश कुमार यादव
गोहपारू। शराब दुकान में प्रिंट रेट से अधिक वसूली (ओवररेटिंग) के मामले में अब एक और बड़ा प्रशासनिक फर्जीवाड़ा सामने आया है। गोहपारू शराब दुकान की मनमानी के खिलाफ ग्रामीणों ने जिस उम्मीद के साथ सीएम हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई थी, उस पर पानी फेरने का काम खुद जिम्मेदार अधिकारियों ने किया है। हैरान करने वाली बात यह है कि शिकायतकर्ता के पास जांच के लिए किसी भी अधिकारी का एक भी फोन नहीं आया, लेकिन कागजों में ‘गलत प्रतिवेदन’ (फर्जी रिपोर्ट) तैयार कर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की जा रही है
अधिकारियों की टेबल पर बैठकर ही हो गई ‘जांच’
नियमानुसार सीएम हेल्पलाइन की शिकायत पर संबंधित अधिकारी को मौके पर जाकर जांच करनी होती है और शिकायतकर्ता के बयान दर्ज करने होते हैं। लेकिन गोहपारू के इस मामले में L2 स्तर के अधिकारियों और आबकारी अमले ने दफ्तर की बंद एसी कमरों में बैठकर ही जांच पूरी कर ली। शिकायतकर्ता का साफ कहना है कि उनके पास विभाग के किसी भी छोटे या बड़े अधिकारी का कोई संपर्क नहीं हुआ। ऐसे में सवाल उठता है कि अधिकारियों ने किसके इशारे पर और क्या देखकर प्रतिवेदन तैयार कर दिया?
शराब ठेकेदार को बचाने की खुली कोशिश
ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि आबकारी विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारी पूरी तरह से शराब ठेकेदार के आगे नतमस्तक हैं। ओवररेटिंग के पुख्ता सबूत होने के बावजूद शिकायत को दबाने के लिए फर्जी प्रतिवेदन का सहारा लिया जा रहा है। अधिकारियों की यह कार्यप्रणाली दर्शाती है कि क्षेत्र में नियमों का नहीं, बल्कि ‘माफिया और अफसरों के गठजोड़’ का राज चल रहा है।
जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग
इस फर्जीवाड़े के सामने आने के बाद अब ग्रामीणों में आक्रोश और भड़क गया है। ग्रामीणों ने मांग की है कि L2 अधिकारी ने जो प्रतिवेदन वरिष्ठ कार्यालय को भेजा है, उसे सार्वजनिक किया जाए। आखिर उसमें ऐसा क्या लिखा गया है जो जमीनी हकीकत से बिल्कुल उलट है? यदि बिना जांच के शिकायत बंद की गई, तो ग्रामीण इस पूरे मामले को लेकर जिला कलेक्टर और संभाग आयुक्त (कमिश्नर) के सामने पेश होकर अधिकारियों के खिलाफ भी शिकायत दर्ज कराएंगे
