क्या लखनऊ के चुनाव में राजनाथ को टक्कर दे पाएंगी पूनम और आचार्य प्रमोद

अनंत प्रकाश

बीजेपी नेता राजनाथ सिंह ने बीते मंगलवार लखनऊ लोकसभा सीट के लिए अपना नामांकन भर दिया है.
इसके बाद कांग्रेस ने इसी सीट पर आचार्य प्रमोद कृष्णम को टिकट दिया और सपा-बसपा गठबंधन ने पूनम सिन्हा को चुना है.
दिलचस्प बात ये है कि सिन्हा ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता भी मंगलवार को ही हासिल की है और अब वह लखनऊ में अपने लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि इस त्रिकोणीय मुक़ाबले में लखनऊ की जनता किसे चुनेगी?
साल 1991 से अटल बिहारी वाजपेयी की धमाकेदार जीत के बाद से बीते लोकसभा चुनाव में राजनाथ सिंह की शानदार जीत तक ये सीट बीजेपी के ख़ाते में ही रही है.
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इस सीट से पांच बार सांसद बने. इसके बाद 2009 के चुनाव में लखनऊ की जनता ने लाल जी टंडन चुनकर संसद में भेजा.

पिछले लोकसभा चुनाव में भी राजनाथ सिंह ने कांग्रेस की उम्मीदवार रीता बहुगुणा जोशी को दो लाख 72 हज़ार मतों से हराया था.

लेकिन समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने हाल ही में कहा था कि सपा-बसपा गठबंधन लखनऊ में एक मजबूत उम्मीदवार उतारेगा.

ऐसे में सवाल उठता कि क्या पूनम सिन्हा लखनऊ की जनता का दिल जीतकर राजनाथ सिंह को टक्कर दे पाएंगी.

लेकिन लखनऊ में पूनम की उम्मीदवारी को लेकर बीते कुछ समय से चर्चाएं गरम थीं.
वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन बताती हैं, “हाल ही में जब शत्रुघ्न सिन्हा और अखिलेश यादव की मुलाकात हुई थी तो ये ख़बरें उड़ी थीं कि पूनम सिन्हा लखनऊ से चुनाव लड़ सकती हैं. क्योंकि उनके पति जाति से कायस्थ हैं. ऐसे में ये संभव है कि कायस्थ मतदाताओं के साथ-साथ मुसलमान मतदाताओं को लुभाने की उम्मीद से उनके नाम पर फ़ैसला लिया गया हो. लेकिन एक उम्मीदवार के रूप में पूनम काफ़ी कमजोर कैंडीडेट हैं. उन्होंने लखनऊ में किसी तरह का कोई काम नहीं किया है.”

लखनऊ की आबादी में दस फीसदी मतदाता कायस्थ हैं. इस वर्ग में चार फीसदी हिस्सा सिंधी समुदाय का है. पूनम सिन्हा हैदराबाद के सिंधी समुदाय से आती हैं और उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा से शादी की.

ऐसे में समाजवादी पार्टी पूनम सिन्हा की उम्मीदवारी की बदौलत लखनऊ में कायस्थ और सिंधी मतदाताओं के बीच पैर जमाने की कोशिश करती हुई दिख रही है.

इससे पहले के चुनावों में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है.

ऐसे में पार्टी इस तरह इस लोकसभा सीट में नई ज़मीन तलाशने की कोशिश करती हुई दिख रही है.

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन मानती हैं कि पूनम सिन्हा को उम्मीदवार बनाकर सपा-बसपा गठबंधन ने एक तरह से राजनाथ सिंह की मदद की है.

क्योंकि दस फीसदी मतों के लिए किसी को बाहर से लाकर उम्मीदवार बना देना एक तरह से चुनावी जंग से पहले ही हार मान लेने जैसा है.

अब बात करें कांग्रेस के उम्मीदवार आचार्य प्रमोद कृष्णम की तो प्रमोद कृष्णम को एक धार्मिक उपदेशक के रूप में पहचान हासिल है.

इससे पहले वह कांग्रेस के ही टिकट पर संभल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ चुके हैं जिसमें उन्होंने मोनिका बेदी को अपने चुनाव प्रचार के लिए बुलाया था.

ऐसे में सवाल उठता है कि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने एक बार फिर लखनऊ जैसी अहम सीट के लिए प्रमोद कृष्णम पर दांव क्यों लगाया.

वरिष्ठ पत्रकार राम दत्त त्रिपाठी मानते हैं कि इसकी वजह लखनऊ लोकसभा सीट में ब्राह्मण वोटबैंक है.

त्रिपाठी कहते हैं, “बीते लोकसभा चुनाव में हार के बाद रीता बहुगुणा जोशी बीजेपी में शामिल हो गई हैं. ऐसे में उनके पास एक तरह से उम्मीदवार की कमी तो थी. लेकिन इसके बाद भी लखनऊ में कांग्रेस काडर में तमाम ऐसे नेता हैं जिन पर भरोसा किया जा सकता था. लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस ने एक धर्मगुरू की पहचान वाले शख़्स को अपना टिकट दिया. इसकी एक ही वजह हो सकती.”

“कांग्रेस इस सीट में प्रमोद कृष्णम की धर्मगुरू वाली पहचान की बदौलत ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाने की कोशिश करना चाहती है. लेकिन इसके साथ ही ये भी साफ़ है कि लखनऊ में कृष्णम ने कुछ काम नहीं किया है.”

लखनऊ लोकसभा सीट पर आने वाली 6 मई को मतदान के बाद ही पता चलेगा कि किस चुनावी पार्टी की रणनीति काम आई और किसकी रणनीति बेकार साबित हुई
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