वेलिंग्टन: समुद्र के बीच एक सुनसान और बेहद दुर्गम द्वीप पर करीब दो सदियों तक दुनिया से अलग रहकर सूअरों की एक ऐसी आबादी विकसित हुई, जिसने वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। कहानी शुरू होती है साल 1807 से, जब जहाज के कैप्टन अब्राहम ब्रिस्टो ने न्यूजीलैंड के ऑकलैंड द्वीप (तूफानी द्वीप) समूह के एक हिस्से में कुछ सूअर छोड़ दिए थे। उद्देश्य था कि भविष्य में अगर कोई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो जाए और उसके लोग वहां फंस जाएं, तो उनके लिए भोजन का इंतजाम हो सके।
लगभग 192 साल बाद जब वैज्ञानिकों की एक टीम इन सूअरों की तलाश में द्वीप पर पहुंची, तो वहां की परिस्थितियों में जीवित बचे इन जानवरों को देखकर वह हैरान रह गई। समय के साथ इन सूअरों का शरीर, व्यवहार और आनुवंशिक बनावट सामान्य फार्म में पाले जाने वाले सूअरों से काफी अलग हो चुकी थी।
जहाज दुर्घटनाओं से बचने के लिए निकाला गया था अनोखा उपाय
ऑकलैंड द्वीप समूह न्यूजीलैंड से करीब 560 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। यह क्षेत्र सब-अंटार्कटिक इलाके में आता है और यहां का समुद्र बेहद खराब मौसम तथा तेज हवाओं के लिए जाना जाता है।
19वीं सदी की शुरुआत में इस इलाके से गुजरने वाले जहाजों के दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा काफी अधिक था। हादसे के बाद जहाज के चालक दल के लोग कई महीनों तक द्वीपों पर फंसे रह सकते थे। ऐसी स्थिति में भोजन की भारी समस्या पैदा हो जाती थी।
इसी समस्या को देखते हुए कैप्टन अब्राहम ब्रिस्टो ने 1807 में एंडरबी द्वीप और मुख्य ऑकलैंड द्वीप के उत्तरी हिस्से में कुछ सूअर छोड़ दिए। बाद के वर्षों में भी वहां सूअर छोड़े गए। धीरे-धीरे उन्होंने द्वीप के उत्तरी इलाकों में अपनी आबादी बना ली।
दो सदियों तक दुनिया से अलग रहे सूअर
दुर्गम वातावरण और समुद्र से घिरे होने के कारण इन सूअरों का बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग खत्म हो गया। वे कठोर मौसम, सीमित भोजन और प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच खुद को जीवित रखने के लिए लगातार संघर्ष करते रहे।
लंबे समय तक अलग-थलग रहने का असर उनकी आनुवंशिक संरचना पर भी पड़ा। व्यावसायिक फार्मों में पाले जाने वाले सूअरों की तुलना में इन जानवरों को कई सामान्य संक्रमणों का सामना नहीं करना पड़ा। वैज्ञानिकों के लिए यही बात उन्हें बेहद खास बनाती थी।
समय के साथ ऑकलैंड द्वीप के इन सूअरों में ऐसे आनुवंशिक गुण विकसित हुए, जो दुनिया की दूसरी सूअर आबादी में सामान्य रूप से नहीं पाए जाते थे।
1999 में सूअरों की तलाश में पहुंची टीम
1807 में सूअर छोड़े जाने के करीब 192 साल बाद, यानी 1999 में शोधकर्ताओं की एक टीम इन जानवरों को पकड़ने के लिए ऑकलैंड द्वीप पहुंची। टीम ने कुत्तों की मदद से सूअरों को खोजने और पकड़ने का अभियान चलाया।
शोधकर्ताओं ने जब इन जानवरों को करीब से देखा तो वे सामान्य फार्म के सूअरों से बिल्कुल अलग नजर आए। ये सूअर अपेक्षाकृत छोटे, दुबले, फुर्तीले और कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए अनुकूलित थे।
टीम के सदस्य पीटर जैक्सन के मुताबिक, द्वीप के कठोर वातावरण ने इन सूअरों की पूरी जीवनशैली को प्रभावित किया था। भोजन की कमी लगातार एक बड़ी चुनौती बनी रही। यहां तक कि मादा सूअरों में दूध पिलाने वाले काम करने वाले थनों की संख्या भी कम पाई गई, जिसके कारण बहुत कम बच्चे वयस्क होने तक जीवित रह पाते थे।
अभियान के दौरान टीम 17 सूअरों को पकड़ने में सफल रही। इनमें कई गर्भवती मादाएं भी शामिल थीं। इसके बाद सभी जानवरों को नाव के जरिए इनवरकारगिल स्थित क्वारंटीन सेंटर ले जाया गया।
मेडिकल रिसर्च के लिए क्यों महत्वपूर्ण बने ये सूअर?
शोधकर्ताओं के लिए इन सूअरों की सबसे बड़ी खासियत उनकी आनुवंशिक और संक्रमण संबंधी स्थिति थी। अध्ययन में पाया गया कि ये जानवर कई ऐसे संक्रामक एजेंटों से मुक्त थे, जो मेडिकल रिसर्च में सूअर के ऊतकों का इस्तेमाल करने में बाधा बन सकते हैं।
इनमें पोर्सिन एंडोजेनस रेट्रोवायरस का स्तर भी ऐसा पाया गया, जिसे वैज्ञानिकों के लिए नियंत्रित करना और ट्रैक करना संभव था। यह एक आनुवंशिक तत्व है, जिसे अलग-अलग प्रजातियों के बीच अंगों या कोशिकाओं के प्रत्यारोपण यानी जेनोट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण माना जाता है।
डायबिटीज के इलाज में भी दिखी उपयोगिता
इन विशेषताओं के कारण ऑकलैंड द्वीप के सूअर मेडिकल रिसर्च के लिए बेहद उपयोगी साबित हुए। खासकर जेनोट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में इनका इस्तेमाल महत्वपूर्ण माना गया।
टाइप-1 डायबिटीज जैसी बीमारियों के संभावित इलाज पर काम करने वाली रिसर्च टीमों और कंपनियों ने शुरुआती स्तर के क्लिनिकल ट्रायल में इन सूअरों से प्राप्त इंसुलिन बनाने वाली आइलेट कोशिकाओं का इस्तेमाल किया।
वैज्ञानिकों के लिए यह मामला इस बात का अनोखा उदाहरण है कि करीब दो सदियों तक इंसानी संपर्क और आधुनिक फार्मिंग सिस्टम से दूर रहने के कारण किसी पशु आबादी में ऐसे गुण विकसित हो सकते हैं, जो बाद में मानव चिकित्सा अनुसंधान के लिए उपयोगी साबित हों।
1807 में जहाज दुर्घटना में फंसे लोगों के लिए भोजन का इंतजाम करने के उद्देश्य से छोड़े गए ये सूअर करीब दो सदी बाद वैज्ञानिकों के लिए एक अनमोल जैविक संसाधन बन गए। एक साधारण आपातकालीन इंतजाम से शुरू हुई यह कहानी आज मेडिकल रिसर्च और जेनोट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में अपनी अलग अहमियत रखती है।
