प्राकृतिक उपादानों का भंडार है कजरा, इसके विकास की अवरूद्धता का क्या है माजरा
डॉ आर लाल गुप्ता
लखीसराय/कजरा। सिक्के के दो पहलू की तरह आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक समावेश का केंद्र कजरा अपने गौरवशाली इतिहास के गाथा सीने के पिंजरे में समेटे विकास की चारपाई पर रुग्ण अवस्था में पड़े दिखाई देता है।
सभी नक्षत्रों के ग्रहण की बात किया जाए तो धरती के स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर के तरह प्रकृति सौन्दर्य से आच्छादित कजरा भी कश्मीर के तरह आतंकवादी अलगाववादी तो नहीं परन्तु नक्सलवादी का शिकार होकर बरसों तक यहां की धरती खूनी इतिहास का गवाही है। कुछ ऐसी दास्तान कजरा के प्राकृतिक सुंदतरता के बीच घटित हुई है। जिले के तीन नक्सल बाहुल्य क्षेत्र में शुमार चानन, पीरी बाजार के अलावे कजरा का दूर्गम पहाड़ी है। जहां के इतिहास नक्सली गतिविधियों के खुनी रंग से पटा है। जहां पहाड़ियों में सघन रूप से नक्सलियों का सक्रिय होने की खबर पुलिस के मुखवीरो को मिलती है और पुलिस दल बल के साथ सुचना स्थल पर पहुंच जाती है।यह घटना 29 अगस्त 2010 में घटित हुई जो इस क्षेत्र के काले अध्याय में शामिल होकर रह गई। प्रशासन के आला अधिकारी के पहल पर तत्कालीन एस एच ओ झुलन प्रसाद यादव जो कबैया थाना के थाना अध्यक्ष थे उन्हें नक्सलियों से दो-दो हाथ करने का सम्मन जारी किया गया। दुर्गम पहाड़ी के बीच कानीमोह व राजघाट कोल के मैदान में भारी मात्रा में पुलिस के जवान नक्सलियों से दो-दो हाथ करने के लिए पहुंचते हैं तभी तड़ातड गोलियों की आवाज से इलाका गुंज उठता है, और जब तक पुलिस टीम कुछ समझ पाए इसके पहले एस एच ओ झुलन प्रसाद यादव का शरीर गोलियों से लहूलुहान होकर जमीन पर गिर जाता है। इनके साथ ही सात पुलिसकर्मी भी मौके पर शहीद हो जाते हैं।और कई जवान घायल हो जाते हैं।यही नहीं प्रशिक्षु दरोगा रूपेश कुमार सिंन्हा एवं आदिवासी समुदाय के एक सिपाही मुर्मू को ढाल बनाकर नक्सली अपने साथ ले जाते हैं।
तत्कालीन मीडिया कर्मी खबर पाकर जब पहुंचते हैं तो कई पुलिस कर्मी को घायल देख अपने बलबूते पर उन्हें किसी तरह कजरा बाजार ले आते हैं जहां फर्स्ट एड ट्रेनिंग के चिकित्सक डॉक्टर आर लाल गुप्ता के टीम के द्वारा उनके रग से बहते खुन को फर्स्ट एड ट्रीटमेंट के द्वारा राहत पहुंचाते हुए अस्पताल को रेफर कर देते हैं। जिससे उनकी जान बच जाती है।
आज के तारिख में सरकार के सफल प्रयास से इस क्षेत्र में नक्सलियों के सफाया को लेकर अनेकों अभियान चलाया जिससे या तो मुठभेड़ में कई नक्सली मार गिराए गये तो बालेश्वर कोड़ा जैसे बिहार झारखंड के एरिया कमांडर हार्डकोर नक्सली को पुलिस दबिस में आत्मसमर्पण करना पड़ा। बहरहाल कजरा में स्थायी रुप से पुलिस पिकेट बना दी गई है जिसका परिणाम क्षेत्र को भयमुक्त देखा जा रहा है।
हालांकि नक्सलियों का सम्पूर्ण रूप से खात्मा भी नहीं माना जा सकता। हालांकि कभी कभार नक्सली गतिविधियों की सुचना मिलती रहती है। जहां पुलिस प्रशासन की तत्परता से वे अपने इरादे पुरे नहीं कर पाते और या तो पकड़े जाते हैं अथवा जान बचाकर भाग खड़े होते हैं।
दुसरी ओर पौराणिक काल की चर्चा की जाये तो यह क्षेत्र को तपोभूमि के नाम से भी प्रसिद्धी प्राप्त है।मुनी श्रृंगी ऋषि की तप साधना स्थली कजरा थानांतर्गत श्रृंगी ऋषि धाम है जहां से चक्रवर्ती राजा दशरथ को पुत्रेष्टि यज्ञ के खीर का प्रसाद से राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न का इस धरा धाम पर अवतरण हुआ था। आज भी श्रृंगी ऋषि स्थल आस्था का केंद्र बना हुआ है जहां धर्मात्माओं का आना जाना लगा रहता है जहां मन्नतें पूरी होती है। वैसे ही जल्प्पा स्थान की मां ज्वललप्पा दूधारू पशुओं के स्वास्थ्य का परिचायक हैं जहां श्रद्धालु अपने मवेशियों के दूध यहां चढ़ावे के रूप में अर्पित करते हैं।यह दीगर बात है कि इतने प्रसिद्धि प्राप्त स्थल को पर्यटन क्षेत्र का दर्जा अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। जबकि गुनगुने स्वच्छ पानी का जलप्रपात सालो भर बहते रहता है जिसे मोरवे डैम में संचय कर समय समय पर डैम के गेट खोलकर किसानों को सिंचाई के लिए पानी दी जाती है।हलांकि इस पानी की कनेक्टिविटी कजरा के श्री किसुन, मदनपुर एवं अरमा पंचायत के साथ नहीं रहने के कारण इन पंचायतों के किसानों को अपने खेती के लिए लाभ नहीं मिलता।
अब जहां तक कजरा में ट्रेनों के ठहराव की बात की जाए तो पहले से भी कई जोड़ी ट्रेनों का ठहराव कजरा रेलवे स्टेशन पर नहीं होती थी। कोरोना काल से डाउन से गुजरने वाली कोई ट्रेनों का ठहराव निरस्त कर दी गई जो अभी तक बहाल नहीं की गई है। जिससे कजरा रेलवे स्टेशन में दिनों दिन राजस्व के आमदनी की कमी देखी जा रही है।
कैसे हो सकता है कजरा का विकास
लोगों को माने तो कजरा के विकास में अहम भूमिका श्रृंगी ऋषि धाम को काया कल्प करते हुए इस पर्यटक के रूप में विकसित किया जाए साथ ही फिल्म इंडस्ट्री खोलकर क्षेत्र का विकास किया जा सकता है जिसके लिए जनप्रतिनिधियों के पहल की आवश्यकता है। इसके अलावे ठहराव उठ चुके ट्रेनों का ठहराव देने के साथ ही दुर्गामी ट्रेनों का ठहराव दिया जाना चाहिए। जो अभी के माहौल में कल्पनातीत लगता है। प्राकृतिक उपादानों का भंडार है कजरा, इसके विकास के आवरुद्धता का क्या है माजरा। आप समझ गए होंगे।
