शहडोल से राजेश कुमार यादव
-शहडोल जिले में ‘जननी’ सुरक्षा के दावों की खुली पोल, जच्चा-बच्चा की जिंदगी को दांव पर लगा रहा जिम्मेदार तंत्र
मध्य प्रदेश सरकार ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाओं को सुदृढ़ करने और ‘जननी’ (गर्भवती महिलाओं) को सुरक्षित प्रसव की गारंटी देने के लिए करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा रही है। लेकिन शहडोल जिले के गोहपारू ब्लॉक में बैठे जिम्मेदार अधिकारी और आपातकालीन सेवाओं के ठेकेदार इन दावों की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। ताजा और बेहद आक्रोशित करने वाला मामला गोहपारू सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) के अंतर्गत आने वाले ग्राम करीं से सामने आया है, जहाँ आपातकालीन 108 एम्बुलेंस सेवा की एक ऐसी जानलेवा लापरवाही उजागर हुई है, जिसे सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए।
3 घंटे तक जिंदगी और मौत के बीच झूलती रही प्रसूता
घटनाक्रम के अनुसार, ग्राम करीं में एक बेबस गर्भवती महिला को अचानक तीव्र प्रसव पीड़ा शुरू हुई। दर्द से तड़पती महिला की हालत देख परिजनों और ग्रामीणों के हाथ-पाँव फूल गए। स्थिति की गंभीरता और आपातकाल को देखते हुए ग्रामीण छोटेलाल सिंह ने सजगता दिखाते हुए तत्काल सरकारी आपातकालीन सेवा 108 एम्बुलेंस को फोन किया। उन्होंने ऑपरेटर को पूरी लोकेशन नोट कराई और महिला की गंभीर स्थिति का हवाला देते हुए जल्द से जल्द गाड़ी भेजने की गुहार लगाई।
लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह डिजिटल इंडिया और मुस्तैद स्वास्थ्य विभाग के दावों पर करारा तमाचा है। प्रसव जैसी अति-संवेदनशील स्थिति में, जहाँ एक-एक सेकंड जच्चा और बच्चा की जिंदगी के लिए कीमती होता है, वहाँ कॉल करने के पूरे 3 घंटे बाद भी 108 एम्बुलेंस मौके पर नहीं पहुंची।
नरक से बदतर गुजरे 3 घंटे, ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
परिजनों के लिए वह 3 घंटे किसी नरक से कम नहीं थे। एक तरफ महिला दर्द से चीख रही थी, तो दूसरी तरफ ग्रामीण छोटेलाल सिंह और अन्य लोग बार-बार सड़क की तरफ एम्बुलेंस की राह तक रहे थे। जब सिस्टम की तरफ से कोई मदद नहीं मिली, तो ग्रामीणों में हड़कंप मच गया। ग्रामीणों का कहना है कि एम्बुलेंस प्रबंधन की इस घोर संवेदनहीनता ने माँ और उसके होने वाले बच्चे, दोनों को सीधे मौत के मुंह में धकेल दिया था। गनीमत रही कि ग्रामीणों ने समय रहते अन्य निजी या वैकल्पिक साधनों के लिए दौड़-भाग शुरू की, अन्यथा कोई भी बड़ी अनहोनी हो सकती थी।
क्या कागजों तक सीमित है ‘जननी सुरक्षा योजना’?
यह कोई पहला मामला नहीं है जब गोहपारू क्षेत्र के सुदूर गांवों में 108 एम्बुलेंस समय पर न पहुंची हो। क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि एम्बुलेंस के नाम पर बड़ा खेल चल रहा है। गाड़ियों के मेंटेनेंस, ईंधन या चालकों की मनमानी के कारण अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब मरीज इस सेवा से वंचित रह जाते हैं। ग्राम करीं की इस घटना ने साफ कर दिया है कि गोहपारू CHC के अंतर्गत आने वाले गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह भगवान भरोसे हैं।
प्रशासन से सीधे 4 तीखे सवाल (जिसका जवाब जनता चाहती है):
1.: जब 108 सेवा का नाम ‘आपातकालीन’ है, तो प्रसव पीड़ा जैसी गंभीर स्थिति में भी 3 घंटे तक गाड़ी क्यों नहीं पहुंची? क्या एम्बुलेंस कंट्रोल रूम और स्थानीय अमला सो रहा था?
- कॉलर छोटेलाल सिंह द्वारा लगातार सूचना दिए जाने के बावजूद एम्बुलेंस को ग्राम करी पहुंचने से किसने रोका? क्या गाड़ियों की कमी है या कर्मचारियों की घोर लापरवाही?
- ग्रामीण क्षेत्रों में सुरक्षित प्रसव के लिए सरकार जो करोड़ों का बजट देती है, वह धरातल पर क्यों नजर नहीं आ रहा? क्या गोहपारू CHC प्रभारी इस बात से अनभिज्ञ हैं?
- अगर इस 3 घंटे की देरी के दौरान महिला या शिशु के साथ कोई अनहोनी (जान माल का नुकसान) हो जाती, तो क्या जिला प्रशासन या स्वास्थ्य विभाग इसकी जिम्मेदारी लेता? या हमेशा की तरह मामले को दबा दिया जाता?
तत्काल कार्रवाई की मांग, वरना होगा आंदोलन
इस घटना के बाद से ग्राम करीं सहित पूरे गोहपारू ब्लॉक के ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों में भारी आक्रोश व्याप्त है। ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) से मांग की है कि इस पूरे मामले की तत्काल उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। ड्यूटी पर तैनात जिन कर्मचारियों या एम्बुलेंस ऑपरेटर ने इस कॉल को नजरअंदाज किया और 3 घंटे तक प्रसूता को तड़पने के लिए छोड़ दिया, उन पर आपराधिक लापरवाही का मामला दर्ज कर सख्त कार्रवाई की जाए। यदि जल्द ही इस व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ और दोषियों पर गाज नहीं गिरी, तो ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र का घेराव करने के लिए मजबूर होंगे।
