प्रवासी मजदूरों के बोलते तस्वीर

अरुण कुमार चौधरी

इस समय भारत माता की संतान गरीब प्रवासी मजदूर बहुत ही कठिन समय से गुजर रहे हैं, इनकी सुध लेने के लिए मोदी सरकार के पास समय नहीं है !इसलिए हम लोग भारत के नागरिक के नाते प्रवासी मजदूरों की तत्कालीन समस्याओं को समय-समय पर उठाते रहते हैं और सत्ता भोगी पार्टी और नेताओं की सच्ची बात पाठकों के सामने रखता हूं! इसी क्रम में आज हम सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री आदित्य नाथ योगी एक प्रवासी मजदूर के प्रति असंवेदनशील फोटो लगा रहा हूं जिसमें उन्होंने औरैया की घटना में मरे मजदूरों की लाश के साथ के साथ घायल तथा अन्य लोगों को भी एक ट्रक कंटेनर में में बैठाकर झारखंड भेज दिया था जबकि बाद में झारखंड के मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन की भारी नाराजगी के बाद योगी सरकार उसे एक एंबुलेंस में लाश को भेजा! इसके अलावा भी विभिन्न प्रकार के फोटो इस लेख में लगा रहा हूं जिससे कि आपको पता चलेगा कि प्रवासी मजदूरों पर कितना बड़ा पहाड़ टूट गया है ,जिसके लिए हमारे पास शब्द की कमी हो रही है !
अब आप निम्नलिखित फोटो का अवलोकन कर स्वयं ही निर्णय ले की यह मोदी सरकार कितनी ही निर्दय  तथा अहंकार में  में डूबा हुआ है!

2   प्रवासी मजदूर घर  जाने के लिए जद्दोजहद में

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3.प्रवासी मजदूर अपने बच्चों के साथ पैदल चल रहें है!

4 प्रवासी महिला    मजदूर  रेल पटरी पर चल रहें है!

5     प्रवासी मजदूर अपने बच्चों को साइकिल पर लेकर चल पड़े

6 प्रवासी महिला    मजदूर थक कर बच्चों को पानी पीला रहें हैं

7 प्रवासी मजदूर अपने बच्चों को साइकिल पर हैं तथा   पत्नी पीछे -पीछे कड़ी धूप में चल रही

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बिहार के जहानाबाद की सड़क पर अपने तीन साल के बेटे की लाश लिए दौड़ती-रोती महिला का वीडियो इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है

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कभी  पैदल, कभी साइकिल और कभी ट्रक की सवारी करके पहुंचे इन बाप बेटी की कहानी,
पापा में थी हिचक, बेटी के हौसले ने पूरी कर दी यात्रा
“खाने पीने को कोई पैसा नहीं रह गया था. रूम मालिक भी तीन बार बाहर निकालने की धमकी दे चुका था. वहां (गुरूग्राम) मरने से अच्छा था कि हम रास्ते में मरें. इसलिए हम पापा से कहें कि चलो साइकिल से. पापा नहीं मानते थे, लेकिन हम ज़बरदस्ती किए

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संदीप नोएडा के सेक्टर 122 में सड़क पर ही बीते 6 साल से मसाले (खाने वाले) की छोटी सी दुकान लगाते हैं. वो बताते हैं कि 21 मार्च को प्रशासन ने दुकानें बंद करा दीं. जिसके बाद उन्होंने डेढ़ महीना लॉकडाउन ख़त्म होने का इंतजार किया. लेकिन जब लॉकडाउन ख़त्म होने का कोई आसार नहीं दिखा तो 12 मई को अपनी गर्भवती पत्नी रेखा देवी और बच्चों को लेकर बिहार के लिए निकल पड़े

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0प्रवासी मजदूरों         चिल -चिलाती धूप में अपने घर की ओर चल पड़ें ।

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.औरंगाबाद के रेल पटरियों पर प्रवासी मजदूरों   के जिस्म के चिथड़े

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———“भैया, डर और भूख भला किसे हिम्मत नहीं देते?” ये शब्द न तो किसी महान दार्शनिक के हैं और न ही किसी कालजयी उपन्यास के किसी महान पात्र के. बल्कि ये तो वह मूल मंत्र है जिसने बलरामपुर के राघोराम को रोहतक से अपने गांव तक चले जाने का संबल दिया और 750 किमी की यात्रा उन्होंने पांच दिनों में अपनी पत्नी के साथ साइकिल से पूरा     किया

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9 माह की गर्भवती, 7 किलोमीटर पैदल चली
नोएडा से गोपालगंज का 900 किलोमीटर से ज़्यादा का सफ़र संदीप और रेखा के परिवार ने ट्रक से तय किया. लेकिन ट्रक वाले ने पकड़े जाने के डर से यूपी-बिहार की गोपालगंज सीमा से तकरीबन 7 किलोमीटर पहले ही इन सभी लोगों को उतार दिया

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ओडिशा के महेश जेना लॉकडाउन के कारण महाराष्ट्र से साइकिल चलाकर अपने प्रदेश पहुंचे हैं. उन्होंने सात दिनों में ही क़रीब पंद्रह सौ किलोमीटर का ये सफ़र तय कर लिया.यूं तो लोग इतनी लंबी साइक्लिंग रेकॉर्ड बनाने या एडवेंचर के लिए ही करते हैं लेकिन महेश जेना के लिए यह कोई ‘एडवेंचर’ नहीं, बल्कि मजबूरी थी

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. आपा– धापी में प्रवासी मजदूर

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77आनंद विहार की वो वायरल तस्वीर

 

  राष्ट्र कवि  रामधारी सिंह दिनकर जी ने अपनी एक कविता में लिखा है कि…‘

मैं मजदूर हूँ मुझे देवों की बस्ती से क्या,

अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाये

अम्बर पर जितने तारे उतने वर्षों से,

मेरे पुरखों ने धरती का रूप सवारा’’…!!!

 

 

 

 

 

 

 

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