ओवैसी का उभरना मुसलमानों के लिए घातक

अरुण कुमार चौधरी

दो दिन पहले ही बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ!  जिसमें बिहार में पहली बार देखा गया कि सबसे 17% आबादी वाले मुस्लिम समाज से एक भी मंत्री नहीं बनाया गया है जो कि बिहार ऐसे समाजवादी पृष्ठभूमि वाले राज्य में एक भी मुस्लिम वर्ग से कोई प्रतिनिधि नहीं हुआ, यह एक बिहार के लिए दुर्भाग्य की बात है। जहां तक कांग्रेस के समय बिहार में एक मुस्लिम मुख्यमंत्री स्वर्गीय अब्दुल गफूर हुआ करते थे वही आज बिहार में मुस्लिम वर्ग से एक भी मंत्री नहीं होना धार्मिक उन्माद एवं विघटन वाली शक्तियों की जीत है।आजादी के बाद यह पहली ऐसी सरकार बताई जा रही है, जिसमें एक भी मुस्लिम नुमाइंदे को जगह नहीं मिल पाई है। ऐसा भी नहीं है कि इस स्थिति के लिए मुसलमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर कोई ऊंगली उठा सकते हैं। क्योंकि, जेडीयू ने जिन 11 मुसलमानों को इस चुनाव में टिकट दिया था, वो सारे के सारे विरोधी दलों के प्रतिद्वंद्वियों से मात खा गए। इसका एक असर यह भी हुआ है कि 2015 में कुल 24 मुस्लिम विधायक चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे, लेकिन इस बार सिर्फ 19 को ही यह मौका मिल पाया है। इनमें 8 आरजेडी से, 5 एआईएमआईएम से, 4 कांग्रेस से और 1-1 बीएसपी और सीपीएम से चुनाव जीते हैं।
2015 में पार्टी से 11 मुसलमान जीते थे। वैसे 2010 में जब एनडीए ने भारी बहुमत से सरकार बनाई थी और राजद 22 सीटों पर सिमट कर रह गई थी, तब भी सिर्फ 16 मुस्लिम विधायक ही जीतकर विधानसभा तक पहुंचे थे। बिहार में 1952 से 2020 तक सबसे ज्यादा 34 मुस्लिम विधायक 1985 में जीते थे। जबकि, 1952 में हुए चुनाव में 24 मुसलमानों को जीत मिली थी।
फिर भी एक भी मुस्लिम इसलिए मंत्री नहीं बन पाया, क्योंकि जेडीयू के सारे 11 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव हार गए और एनडीए के बाकी सहयोगी दलों में से किसी ने एक भी मुसलमान को टिकट ही नहीं दिया था।

‘जंग-ए-आजादी में मुस्लिम समाज’ के लेखक राघव शरण शर्मा बताते हैं कि बिहार में जिन्ना का जबरदस्त विरोध करने वालों में अब्दुल बारी, मजहरूल हक, अब्दुल कयूम अंसारी थे.राघव शरण शर्मा कहते हैं, “मुस्लिम राजनीति को दो भागों में बांट कर देखें तो, एक हिस्सा प्रगतिशील राजनीति करने वालों का था ,मुस्लिम राजनीति में जो प्रगतिशील थे वो आपको कांग्रेस, सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट तीनों जगह मिल जाएंगे.” और दूसरा हिस्सा जिन्ना जमात का था, जिनका मक़सद हिन्दुओं के अंर्तविरोध  तथा धर्म के नाम पर बाँटने   का फायदा उठाना था.उसमें से  अभी   हैदराबाद की एआईएमआईएम ओवैसी की पार्टी है जो कि इस चुनाव में जम कर सीमांचल में आरजेडी को नुक़सान और बीजेपी को फ़ायदा किया।

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इस सवाल पर बिहार की राजनीति को समझने-परखने वालों की राय बंटी हुई है. एआईएमआईएम के उभार को सीमांचल इलाके में महागठबंधन की हार की एक वजह के तौर पर देखा जा रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, “मुसलमानों के 76 फीसदी वोट इस बार चुनाव में महागठबंधन को मिले हैं और जीडीएसएफ गठबंधन जिसमें एआईएमआईएम भी थे उसे तकरीबन 11 फीसदी वोट मिले हैं. ऐसे में ओवैसी की पार्टी को सोशल मीडिया और टीवी जितना बढ़ा चढ़ाकर बोल रहे हैं, वैसा ज़मीन पर नहीं है. हालांकि इस बात से इनकार नहीं कि बिहार में पोलराइजेशन और कांउटर पोलराइजेशन बढ़ रहा है. तारकिशोर प्रसाद जो कटिहार यानी सीमांचल से ही आते है, उनका उपमुख्यमंत्री बनना इसका संकेत है.”

सामाजिक कार्यकर्ता असमां खान कहती हैं, “इस वक्त एक आम मुसलमान ना उम्मीद है. मुस्लिम महिलाओं पर हिंसा बढ़ रही है, एनआरसी-सीएए का मसला भी है और कोई आदमी हमारी आवाज उठाने वाला नहीं. एआईएमआईएम का उभार हुआ है बिहार में, लेकिन बहुत सारे मुसलमान इस पार्टी की राजनीति से इत्तेफाक नहीं रखते हैं. हम सिर्फ वेट एंड वॉच कर सकते हैं.”
नीतीश की पिछली सरकार में भी मुसलमानों की नुमाइंदगी नाम मात्र की ही थी। तब मोहम्मद खुर्शीद उर्फ फिरोज अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री का जिम्मा संभालते थे। लेकिन, इस चुनाव में वोटरों ने उन्हें भी कबूल नहीं किया। वे ऐसी मुस्लिम मंत्री थी, जो पिछली बार विधानसभा में विश्वासमत प्राप्त करने के बाद ‘जय श्रीराम’ लगाकर खूब मशहूर हुए थे। इसके चलते इमारत-ए-शरिया ने इनके खिलाफ फतवा तक जारी कर दिया था। बाद में खुर्शीद ने हालात से समझौता करके उनसे माफी मांग ली थी, लेकिन फिर भी मतदाताओं ने लगता है उन्हें माफ नहीं किया। इस बार राजद से जीतने वाले मुस्लिम विधायकों की भी संख्या कम हुई है।
2012 से पिछड़े मुसलमानों के बीच काम कर रहे संगठन दलित मुस्लिम समाज के समन्वयक हैं.
अयूब कहते हैं, “मुस्लिमों की पिछड़ा-अतिपिछड़ा आबादी जो कुल मुस्लिम आबादी का 85 फीसदी से भी ज्यादा है, उसे टिकट देने में कंजूसी की गई. साथ ही साथ बीजेपी के खिलाफ मुसलमानों में जो एनआरसी और सीएए को लेकर गुस्सा है, उसको कांउटर करने में जेडीयू असफल रही.”
वहीं, राज्य में बीजेपी के एकमात्र मुस्लिम प्रवक्ता अजफर शम्सी कहते हैं, “बीजेपी सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विश्वास पर यकीन रखने वाली पार्टी है. और ये बात बेमानी है कि बीजेपी से किसी मुसलमान को टिकट नहीं मिला. एनडीए ने टिकट दिया है मुसलमानों को. टिकट बंटवारे में तो मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व रहा ही. बाकी यूपी सरकार की तर्ज पर बिहार में भी अल्पसंख्यकों को प्रतिनिधित्व मिलेगा.

इस समय एआईएमआईएम ओवैसी का उभरना मुसलमानों के लिए घातक लग रहा है

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