संताल जनजाति के भगवान सिद्धू- कान्हू

आलोक रंजन
. दुमका : संताल हुल जन आंदोलन( सन्1855-56) का शंखनाद करने वाले सिद्धू- कान्हू को संताल जनजाति के लोग आज भी भगवान मानते हैं. अमर शहीद सिद्धू – कान्हू ने अपने दो भाइयों चांद एवं भैरव तथा दो बहनों फूलों और झानो के साथ मिलकर संताल समाज को शोषण से मुक्त कराने के लिए ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी थी. ब्रिटिश शासन को तार तार करने वाले इन वीर सपूतों में सिद्धू का जन्म सन् 1820 ई. में और कान्हू का जन्म सन्1832 ई. में संताल परगना प्रमंडल के साहिबगंज जिले के बरहेट प्रखंड के भोगनाडीह गांव में हुआ था. इन लोगों ने संताल समाज को शोषण से मुक्ति दिलाने व संगठित करने के लिए 30 जून सन् 1855 ई. को भोगनाडीह मैदान में बैठक कर ही संताल फूल का बिगुल फूंका था जिससे अंग्रेजी हुकूमत हिल गई थी. विद्रोह को खत्म करने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने संताल समाज में फूट डालकर गैर संताली समुदाय को अलग करने का प्रयास किया था.

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जिसका परिणाम रहा कि संताल परगना से लेकर पश्चिम बंगाल के वीर भूम जिला और बिहार प्रांत के मुंगेर जिला तक के संताल जनजाति के लोग एक सूत्र में बंध गए और ब्रिटिश शासन के खिलाफ महाजनी अत्याचार को समाप्त करने के लिए आंदोलन का बिगुल फूंक दिया. वस्तुतः देश में सन् 1857 ई. के क्रांति के पहले विदेशी शासन के खिलाफ संताल हूल जनजातियों सहित हिंदू और मुसलमानों का अभूतपूर्व गठजोड़ महज संगठित ही नहीं बल्कि काफी सशक्त और जुझारू भी था. इसने देश में फिरंगी यो के खिलाफ सभी वर्ग के लोगों को जमीनी अस्तर पर संगठित होने की शिक्षा दी. इसकी ताकत का आभास कराया और आजादी के लिए कुर्बानी देने का जुनून पैदा कर दिया. संताल हुल की इन्हीं विशिष्ट ता ओं ने देश में जन आंदोलन को एक नई दिशा दी. जिससे साम्राज वादियों को अपनी नीति में परिवर्तन करने के लिए विवश होना पड़ा. कालांतर में वह इतना शक्तिशाली और संगठित हो गया कि देश से साम्राज वादियों के पांव उखड़ गए. किसकी ताकत की महत्ता को जमीनी स्तर पर स्थापित करने वाले संताल फूल के महानायक सिद्धू- कान्हू ने अपने क्षेत्र के ग्वालो, कर्म कारों, तेलियो, कुम्हारों, रजवाड़ों, कहारों और डोम आदि हिंदू समुदाय के पिछड़े दलित और गरीब वर्गों से संपर्क स्थापित किया और उन्हें अपने मिशन में शामिल करने में सफलता पायी. पहाड़ियां, भुइयां, धां गड़, को ल आदि जनजातीय समुदाय के लोगों ने भी बड़े पैमाने पर संता लो की मदद की. यह उनकी दूरदर्शिता का ही प्रतिफल था कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय के मोमिनो एवं जुला हो से संपर्क किया और उनका सहयोग और समर्थन प्राप्त कर लिया. उन्होंने हिंदू और मुसलमान समुदाय के बैरागि यो से भी संपर्क किया और उन्हें भी देश के सबसे बड़े मुक्ति युद्ध में शामिल करने में सफलता पायी. इस प्रकार अमर शहीद वीर सपूत सिद्धू- कान्हू आदिवासी, हिंदू और मुस्लिम समुदाय के सर्वमान्य नेता के रूप में उभरे और उनका नेतृत्व किया. सांप्रदायिक सद्भावना और एकता की नींव पर आधारित गठजोड़ को कायम करने के लिए सिद्धू- कान्हू ने जिस दूरदर्शिता सूझबूझ और संगठनात्मक कार्य शैली को अपनाया वह पूरे विश्व के इतिहास में अद्वितीय था. इसके फलस्वरूप हिंदू-मुस्लिम समाज के पिछड़े गरीब और दलित बड़े पैमाने पर मुक्ति युद्ध में शामिल हो गये. मछली पकड़ने वाली मल्लाह जाति, पालकी ढोने वाली भोजवा जाति, श्रमिक व सामान ढोने का कार्य करने वाले धानुक जाति से संता लो ने संपर्क किया और उनका सहयोग व समर्थन भी प्राप्त कर लिया. अतः सिद्धू- कान्हू के कुशल नेतृत्व में आंदोलन फूट पड़ा और ब्रितानी साम्राज्य के एक बड़े क्षेत्र में यह फैल गया. इसकी तेज, व्यापकता, जुझारू पन और अटूट गठजोड़ से अंग्रेज सैनिक व और सैनिक अधिकारी भयभीत हो गए. संताल परगना और भागलपुर के विभिन्न क्षेत्रों के साथ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के नलहटी, रामपुरहाट, नागौर, सिउड़ी, लांगु लिया, गुर जोरी व अन्य स्थानों में संताल फूल का स्वरूप व्यापक व भयावह हो गया. दास कैपिटल और कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो नामक पुस्तक के लेखक विश्व प्रसिद्ध विचारक कार्ल मार्क्स( सन् 1818-83 ई.) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ” नोट्स ऑन इंडियन हिस्ट्री” के माध्यम से यह कहा कि 7 महीने लगातार छापामार युद्ध के बाद सन् 1856 ई. में यह विद्रोह दबाया जा सका. वहीं प्रसिद्ध भारतीय साहित्यकार रविंद्र नाथ टैगोर( सन् 1861-1941 ई.) ने संताल विद्रोह के महानायकों को स्मरण करते हुए कहा कि यद्यपि इस विद्रोह को निश्चित रूप से दबा दिया गया फिर भी इस विद्रोह व इसके नायकों की यश गाथाएं अभी हजारों संतानों में नई स्फूर्ति व शक्ति का संचार करती है. यह आज भी हजारों लाखों संता लो का प्रेरणा स्रोत है. थॉमसन तथा गैरेटस की पुस्तक ” राइट्स एंड फुलफिलमेंट ऑफ ब्रिटिश रूल इन इंडिया” के निम्न ले खां श में इस सशस्त्र विद्रोह के मूल कारण जो कि अंग्रेजो के द्वारा संता लों का आर्थिक शोषण था पर दृष्टि डाली गयी. भारत में सन् 1855 ई. के संताल विद्रोह ज्योति उस समय एक शक्ति के रूप में उदय हुआ, ने ऐसे दमन व विद्रोह को जन्म दिया जो कि 2 वर्षों के भीतर ही समाप्त हो गया. आदिवासी संताल ज्योति प्रकृति की गोद में रहने वाले सीधे-साधे लोग हैं. हिंदू घुसपैठ से परेशान हो गए थे. इनकी भूमि छीन गई तथा यह लोग अधिक चालाक व धूर्त ऋण दाताओं के चंगुल में फंस गए. ये लोग ऐसे स्थानीय अधिकारियों के अधीन व उनके उत्तरदायित्व थे जो इनकी कोई सहायता नहीं करते थे. फिर किसी चेतावनी के बिना बंगाल के बाहरी क्षेत्रों तथा सौ मील तक कोलकाता के आसपास यूरोपीय तथा भारतीयों के सिरों को तोड़ा गया जहर बुझे तीरों का प्रयोग तथा घरों व बंगलों को जलाने जैसे कार्यों की भरमार हो गई. यह सब नरसंहार तथा मृत्यु दंड के रूप में धीरे-धीरे समाप्त हो गया.

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