लोकडाउन में गरीबों की फजीहत : अमीरों को मौज

अरुण कुमार चौधरी

लोक डाउन में मोदी सरकार के घोर उपेक्षा के कारण गरीब लोगों की बड़ी ही फजीहत हुआ है ! गरीबों के बीच एक अलग तरह की मैसेज गया कि हम भारत के गरीब लोगों के लिए देश में कोई सरकार नहीं है !गरीब लोग अपने जीने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे तथा अपनी गरीबी पर आंसू बहा रहे थे! इनकी कहानी करुणा भरी है:-

भारत के लोकतांत्रिक राजनीतिक इतिहास में इन ग़रीबों ने कई दलों के नेताओं की तस्वीरें और झंडा उठाकर पदयात्राएं की हैं. आज जब वे पदयात्रा पर निकलने के लिए मजबूर हुए तो कोई दल उनके काम नहीं आया. दिल्ली से बयान जारी होते रहे, जिस दिल्ली को छोड़ कर वे बिहार के लिए निकल पड़े थे. आज़ाद भारत के इतिहास में दिल्ली की तरफ पीठ कर पैदल चलने का यह पहल मार्च है. अभी तक के सारे मार्च दिल्ली चलो कहलाते थे.
यह लॉन्ग मार्च नहीं है. इसलिए राजनीतिक प्रतिरोध नहीं है. यह अल सुबह टहलने निकलने लोगों की टोली नहीं है. इसलिए शारीरिक अभ्यास एक्ट नहीं है. यह तीर्थ यात्रा नहीं है. इसलिए धार्मिक कार्यवाही नहीं है. मज़दूरों का पैदल चलना लोकतंत्र में उनके लिए बने अधिकारों से बेदखल कर दिए जाने की कार्यवाही है. पैदल चलते हुए वो सिस्टम का इतना ही प्रतिकार कर रहे हैं कि उन रास्तों पर पैदल चल रहे हैं जिन पर चलने की इजाज़त नहीं है.

Haryana Yamunanagar Migrant laborers suicide who worked in a ...

पैदल चलने का यह दृश्य माइग्रेशन यानी पलायन के उस दृश्य के जैसा नहीं है जिसे लोगों ने 1947 में देखा था. आगरा-लखनऊ या सूरत-अहमदाबाद एक्सप्रेस वे पर पैदल चलते इन लोगों का दृश्य पहली बार देखा गया है. इन शहरों में इन्हें आते हुए किसी ने नहीं देखा. इन शहरों से इन्हें जाते हुए दुनिया देख रही है.
मज़दूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया था, . वे पैदल चल रहे हैं. उनके पांवों में छाले पड़ गए ,बहुत से मजदूर रेल की पटरियों के किनारे किनारे चल रहे थे ताकि घर तक पहुंचने का कोई सीधा रास्ता मिल जाए. मज़दूर न तो ट्विटर पर है. न फेसबुक पर और न न्यूज़ चैनलों पर है. वरना वो देखता कि उन्हें लेकर समाज कितना असंवेदनशील हो चुका है. सरकार तो खैर संवेदनशीलता की खान है. इसी क्रम में जालना से औरंगाबाद जा रहे 16 मज़दूर मालगाड़ी से कट कर मर गए. एक घायल है. ये लोग पटरियों पर चलते हुए औरंगाबाद जा रहे थे. 36 किमी पैदल चलने के बाद उन्हें नींद आने लगी. थकान ज़्यादा हो गई. लिहाज़ा पटरी पर ही सो गए. इतनी गहरी नींद में चले गए कि होश भी न रहा और उनके ऊपर से ट्रेन गुजर गई. मज़दूर मध्यप्रदेश के शहडोल और उमरिया के थे
लखनऊ से भी खबर है. जानकीपुरम में रहने वाला एक मज़दूर परिवार साइकिल से निकला था. छत्तीसगढ़ जा रहा था. शहर की सीमा पर किसी ने टक्कर मार दी. माता पिता की मौत हो गई. दो बच्चे हैं. अब उनका कोई नहीं है.
श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में अपने घरों को लौट रहे प्रवासी मज़दूरों को न सिर्फ़ खाने-पीने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, बल्कि रेलवे द्वारा रूट बदलने के कारण कई दिनों की देरी से वे अपने गंतव्य तक पहुंच पा रहे हैं. इस दौरान भूख-प्यास और भीषण गर्मी के कारण मासूम बच्चों समेत कई लोग दम तोड़ चुके थे

Migrant Crisis amid Lockdown: लॉकडाउन में दो ...

जिसमें  एक महिला रेलवे स्टेशन पर बेसुध जमीन पर पड़ी थी उनके ऊपर एक चादर पड़ी था और उनका छोटा-सा बच्चा चादर खींचते हुए मां को उठाने की कोशिश करता हुआ नजर आता था छोटे बच्चे को नहीं मालूम कि जिस चादर के साथ वह खेल रहा है वह हमेशा के लिए मौत की गहरी नींद सो चुकी माँ का कफ़न है। 4 दिन ट्रेन में भूखे-प्यासे रहने के कारण इस माँ की मौत हो गयी।

coronavirus lockdown migrant crisis child tries to wake dead mother at muzaffarpur railway station

वैसे इस समय गरीबों के फरिश्ते बहुत से आगे आकर मजदूरों का सहायता किया है जिसमें सोनू सूद का नाम बहुत ही चर्चित है !कई संगठनों ने मजदूरों की सहायता किया मजदूरों की सहायता किया लेकिन सरकार की सहायता के सामने के व्यक्तिगत सहायता ऊंट के मुंह में जीरा का फोरन होता है

सूरत में लॉकडाउन से परेशान प्रवासी ...

दूसरी ओर न्यूयॉर्क टाइम्स के स्तंभकार श्री रुचि शर्मा अपने लेख में कहा है कि दिल्ली के उदारवादी संभ्रांत लंबे समय से मोदी की स्वेच्छाचारी शैली और हिन्दू-केंद्रित एजेंडा के आलोचक रहे हैं, लेकिन वे भी लॉकडाउन के लिए उनके पीछे चल पड़े। शुरुआत में सरकार ने कोरोना मरीजों को सरकारी अस्पतालों में भर्ती करने का निर्णय लिया, जिससे विशेषाधिकार प्राप्त लोग नर्क की तरह डरते हैं। एक दोस्त ने जब यह कहा कि ‘वायरस भले ही तुम्हें न मारे, सरकारी अस्पताल में तुम जरूर मर जाओगे।’ तो वह पूरी तरह मजाक नहीं कर रहा था।तीन हफ्तों के बाद सरकार ढिलाई वाले लॉकडाउन लाने लगी, लेकिन उच्च-वर्गीय भारतीय रिलेक्स होने की जगह लॉकडाउन के जीवन को पसंद करना सीख रहे थे। उन्होंने नेटफ्लिक्स, जूम पार्टी और साफ आसमान व चांद के दृश्यों की तारीफें कीं। वे बंद पड़े चंडीगढ़ में घूमते चीते की तस्वीरें देख अचंभित होते रहे। वाह प्रकृति!

अब विडंबना यह है कि भारत आजादी के बाद की सबसे बड़ी मंदी की ओर बढ़ रहा है और आर्थिक दबाव ने कोरोना मामले बढ़ने के बावजूद अनलॉक के लिए मजबूर किया है। घर लौटते और वहां जाकर पॉजिटिव आ रहे प्रवासियों की दुर्दशा को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता
आज़ादी के वक्त देश की जनता नंगे पांव चलती थी, इस सत्तर साल में देश फ़्लाइट तक पहुँचा हैं। लेकिन सत्तर साल में क्या हुआ ऐसे सवाल पूछने वालो की सरकार ने सिर्फ छह साल में देश की जनता को फिर से नंगे पांव सड़क पर चलने मजबूर कर दिया!

अब तो जागो मोदी सरकार ———-

 

                                                निवेदन
ऐसे तो हजारों पाठकों का भरपूर सहयोग मिल रहा है, जिसके कारण हम अपनी सच्ची पत्रकारिता को आगे बढ़ा रहे हैं !इसी क्रम में प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि हम भूखे , प्यासी, नंगे पैर, हताश और निराश प्रवासी मजदूरों की स्थिति को प्रस्तुत करता हूं,! इसमें कुछ त्रुटियां हो सकती है, जिसे आप हमें समय-समय पर अवगत करा सकते हैं और आपका सुझाव मेरे लिए बहुत ही मूल्यवान होगा!
इस संबंध में कहना है कि अगर मेरी प्रस्तुति अच्छा लगे, तो आप अपने मित्रों, परिवारजनों तथा बुद्धिजीवियों को अधिक से अधिक इस प्रस्तुति को अग्रसारित करते रहें और हमें हौसला बढ़ाते रहें ।
                                                                                                                                                                                                                      आपका
                                                                                                                                                                                                              अरुण कुमार चौधरी

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Related posts

Leave a Comment