केरल में झारखंड के प्रवासी लड़कियों की करुणा भरी   दास्तान

अरुण कुमार चौधरी

हमने  कई बार रघुवर के बारे में लिखते रहते थे रघुवर मुख्यमंत्री पद के लायक नहीं है क्योंकि इसकी सोच बहुत ही निम्न स्तर का है झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद स्पष्ट हो गया कि  रघुवर नाकाम रहे!रघुवर के कारण झारखंड में कई तरह की समस्याएं हो गई है, सबसे पहले एक झटके में बीजेपी को साफ कर दिया है, झारखंड में    आर एस एस वाले ने  कड़ी मेहनत करके अपना पैर जमाए थे  !, यह तो हुई पार्टी की बात, इस के अलावे   रघुवर  ने    बड़ी ताम- झाम के साथ और  अपनी झूठी वाह – वाही के लिए   झारखंड केआदिवासी -मूलवासी के  लड़के-   लड़कियां   को रोजगार के नाम पर भारत के विभिन्न राज्यों में भेजा!लड़के-  लड़कियां अपनी रोजी रोटी के लिए  विभिन्न राज्यों में चले गए परंतु वहां पर  लोगों को बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ाहै

Jharkhand's daughters returned from Kerala with painful memories

इसी में से कल  आए हुए केरल से युवक-युवती  अपनी करुणा   पूर्ण दास्तान बता रही अब नहीं जायेंगे रोजी-रोटी के चक्कर में केरल. जिल्लत से भरी जिंदगी से निजात मिली है. झारखंड में रह कर ही कुछ काम करेंगे. लॉकडाउन में एक-एक दिन घुट-घुट कर गुजर रहा था. उक्त बातें केरल के एर्नाकुलम से लौटी झारखंड की बेटियों ने कही. अपनी धरती पर आकर खुश दिखीं. उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार ने अच्छी पहल की. हमें अपनों से मिलाया. शनिवार को दिन के 11 बजे झारखंड के विभिन्न जिलों की करीब 500 लड़कियां रांची लौटीं.  ये सभी लड़कियां झारखंड के विभिन्न जिलों से सिलाई-बुनाई का काम करने के लिए केरल गई थीं।खूंटी जिले के चांपी की रहने वाली सुनीता आइन ने बताया कि एक साल पहले केरल गईं। टाटीसिलवे में तीन महीना का सिलाई का कोर्स किया था। घर की स्थिति खराब थी। केरल में हर महीना कभी 8 हजार तो कभी 9 हजार मिलता था। बाहर के राज्य की लड़कियों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता था। यहां रोजगार नहीं मिल रहा था। मजबूर होकर बाहर जाना पड़ा। लॉकडाउन के दौरान भी हमलोग काम करते थे, नहीं करते तो पैसा कट जाता।

Indian Railway News: Ernakulam Express Reach Hatia Railway Station ...

सिमडेगा के पुबेदा गांव की मीणा कुमारी और सुनीता कुमारी ने बताया की शिवानी मैडम तीन महीना पहले केरल ले गई थीं। कहा था कि सिलाई-बुनाई का काम है और महीने में नौ हजार रुपए मिलेगा। पर हमलोगों को 2 से 3 हजार रु. ही महीने में मिलता था। खाना भी नहीं मिलता था। अब कभी कमाने बाहर नहीं जाएंगे।

प्रति माह 8000 रुपये देने की बात हुई थी, लेकिन तीन माह में मात्र 4000 रुपये ही दिये गये. घर जाने की बात कहने पर उन्हें एक वक्त का ही खाना दिया जाता था. जब उन्होंने विरोध किया, तो हाथ पकड़ कर निकाल दिया गया. हजारीबाग की आशा देवी ने कहा कि केरल में सभी लड़कियों को कैदी की तरह रखा जाता था.

विरोधस्वरूप जब लड़कियों ने अपना पंचिंग कार्ड और अालमारी की चाबी दे दी, तो खाना बंद कर दिया गया. रेलवे स्टेशन जाने के लिए वाहन भी नहीं मिला. सभी 20 किमी पैदल चलकर स्टेशन पहुंचे. तीन माह में 24 हजार की जगह मात्र छह हजार रुपये ही दिये गये. वहीं, बोकारो निवासी पिंकी कुमारी ने कहा कि वह भी सिलाई का काम करती थी.

IRCTC Indian Railways : Laborers Came Free from Punjab to ...

उसे भी प्रति माह 8000 रुपये देने की बात कही गयी थी, लेकिन लाॅकडाउन के तीन माह में मात्र तीन हजार रुपये दिये गये. पिंकी ने कहा कि लॉकडाउन में नियमित खाना नहीं मिलता था. साथ ही जबरन काम करने को कहा जाता था. विरोध करने पर भूखा रखा गया. एक जून को वहां से निकाल दिया गया दाने-दाने को हो गयी थीं मोहताज लड़कियों ने कहा कि दो माह के लॉकडाउन के दौरान दाने-दाने को मोहताज हो गयी थीं. जब विरोध किया, तो हॉस्टल से निकाल दिया गया. गुमला निवासी करिश्मा ने बताया कि वह केरल में सिलाई करती थी

हटिया स्टेशन पर थर्मल स्क्रीनिंग के बाद जब वे बाहर निकलीं, तो अपना दर्द बयां किया.  उन्होंने झारखंड सरकार के प्रति आभार जताया.

 

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