कोयला विवाद में अर्जुन मुंडा के परिपक्वता की झलक

अरुण कुमार चौधरी

आज मैं ऐसी राजनीतिक सामाजिक व्यक्ति के बारे में बताने जा रहा हूं, जिसे आज ही इनके मंत्रालय को आदिवासियों के सशक्तीकरण के लिए स्कॉच गोल्ड अवॉर्ड मिला है! यह व्यक्ति झारखंड के जुड़े झारखंड मुक्ति मोर्चा के पार्टी से अपनी राजनीतिक कैरियर शुरू किया है ,जिसने बिहार के दक्षिणी क्षेत्रों के आदिवासियों के लिए एक अलग राज्य बनाने की मांग की। अपने क्षेत्र के स्वदेशी लोगों के कल्याण में एक कट्टर विश्वासियों ने इस मुद्दे पर भावुक महसूस किया और आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। जल्द ही उनका समावेशी दर्शन के कारण उनका राजनीतिक प्रभाव बढ़ता गया और वह 1995 में झामुमो के टिकट पर खरसावां निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधानसभा के लिए चुने गए,जिनका नाम है- अर्जुन मुंडा !
इन्होंने1999 में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में भाजपा में शामिल हो गए इसके बाद झारखंड अलग होने के बाद राज्य के कल्याण मंत्री बने और अब यही से इनकी राजनीतिक सफर की ऊंचाई लगा और इन्होंने 35 वर्षों के उम्र में राज्य के झारखंड राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने और यह राज्य में तीन बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं इनकी अनेक प्रमुख उपलब्धियां हैं;अर्जुन मुंडा ने 2001-2002 में “डोमिसाइल आंदोलन के कारण पैदा हुए तनाव का बचाव किया और जोर देकर कहा कि भारत के प्रत्येक नागरिक को भारतीय संविधान द्वारा देश के किसी भी हिस्से में रहने और काम करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है।उनके कार्यकाल के दौरान, झारखंड को प्रथम लोकायुक्त मिला और राज्य ने 2011 में 34 वें राष्ट्रीय खेलों का सफलतापूर्वक संचालन किया।32 साल के लंबे झांसे को तोड़ा गया जब झारखंड ने पंचायत चुनाव कराकर इतिहास रचा और सहभागितापूर्ण शासन के लिए पीआरआई को सशक्त बनाया।उनकी सरकार ने पारदर्शिता और दक्षता लाने और खरीद प्रक्रिया में समान अवसर प्रदान करने के लिए सरकारी अनुबंधों में ई-टेंडर प्रणाली शुरू की।मुख्‍यमंत्री दाल भात योजना: समाज के सबसे गरीब वर्गों को पौष्टिक भोजन और पोषण प्रदान करनाकन्यादान योजना: वंचित वर्ग की लड़कियों के विवाह में सहायता प्रदान करना।मुफ्त लैपटॉप / टैबलेट: युवाओं को 21 वीं सदी की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने के लिए 2013 में शुरू की !इसके साथ -साथ अभी तक इनके चेहरे पर किसी तरह का भ्रष्टाचार का काला धब्बा नहीं लगा है, इनके अलावे झारखंड में जहां भाजपा के एक अन्य मुख्यमंत्री रघुवर दास हुए जो कि भाजपा और आरएसएस का जमी जमाई जमीन को खो दिया को खो दिया, इसके साथ -साथ रघुवर दास अर्जुन मुंडा का राजनीतिक कैरियर खत्म करने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाए, परंतु इस समय रघुवर दास का राजनीतिक कैरियर भाजपा में तो खत्म हो ही गया है, ऐसे भी रघुवर दास के ऊपर कई तरह के गंभीर भ्रष्टाचार का आरोप है और अर्जुन मुंडा अपनी चाल से आगे बढ़ते गए , इस समय भाजपा झारखंड में ही नहीं बल्कि आम जनता में भी अर्जुन मुंडा एक लोकप्रिय नेता माने जाते है

President Ram Nath Kovind greets Arjun Munda after taking the oath of office and secrecy as Cabinet Minister

इस सब के कारण अर्जुन मुंडा को मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिला है! इस समय झारखंड सरकार और केंद्र सरकार में कोयला नीलामी को लेकर काफी तनाव पैदा हो गया है और इस तनाव को कम करने के लिए मोदी जी ने अर्जुन मुंडा को लगाए हैं, ऐसे अर्जुन मुंडा और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन एक दूसरे को काफी सम्मान करते हैं और अभी के समय में पहली बार देखा गया है कि राजनीतिक विरोधी झारखंड मुक्ति मोर्चा को भाजपा के करीब लाने का श्रेय अर्जुन मुंडा को मिला है । 2009 के विधानसभा चुनाव के बाद जब किसी दल को स्पष्ट जनादेश नहीं मिला तो भाजपा और झामुमो ने मिलकर सरकार बनाई थी। शिबू सोरेन मु्ख्यमंत्री बने, लेकिन जल्द ही सरकार गिरी तो अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बनाए गए। उस वक्त अन्य नेताओं खासकर किसी गैर आदिवासी नेता के नाम पर झामुमो का शीर्ष नेतृत्व तैयार नहीं था। शिबू सोरेन के मंत्रिमंडल में रघुवर दास उप मुख्यमंत्री थे, जबकि अर्जुन मुंडा की कैबिनेट में हेमंत सोरेन को यह पद मिला।
इस मुलाकात के बाद हेमंत सोरेन भी काफी नरम हो गये है और उन्होंने यहां तक कहा है कि समन्वय व बातचीत का सिलसिला अगर पहले हुआ होता तो इन मुद्दों पर झारखंड का स्टैंड कुछ अलग होता। जाहिर है केंद्रीय मंत्री के साथ अर्जुन मुंडा का आना रिश्तों की तल्खी को कम कर गया।। कोयला नीलामी की प्रक्रिया पर इस मुलाकात का क्या असर पड़ेगा, यह भी देखना होगा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से केंद्रीयमंत्री गुहार लगा चुके हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर पुनर्विचार करें

राजनीति में दलीय बाध्यताओं के बीच पुराने रिश्तों की भी भारी अहमियत है। तभी तो केंद्र सरकार के खिलाफ लगातार मुखर चल रहे झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सौहार्दपूर्ण रिश्ता कायम करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री और जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा खास तौर पर लगाए गए हैं। दरअसल, कुछ नीतिगत मामलों का विरोध कर हेमंत सोरेन ने हाल के दिनों में केंद्र सरकार की मुश्किलें बढ़ाई हैं। वे कोयला खदानों की नीलामी के सख्त खिलाफ हैं और इसके विरुद्ध उन्होंने सुप्रीमकोर्ट की शरण ली है। इसके अलावा वे कोल रायल्टी को लेकर झारखंड के हक की मांग लगातार करते रहे हैं।

इन मुद्दों को सुलझाने के लिए अब साबित हो गया है कि राजनीतिक विचार की वैधता के बीच पुरानी मित्रता काफी अहम होती हैऔरआम लोगों में ऐसी चर्चा है कि इस कोयले विवाद को सुलझाने में अर्जुन मुंडा का व्यक्तित्व काफी परिपक्वता के रूप से उभर कर आया है !

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