नीतीश  बाबू प्रवासी मजदूरों को अपने घर भेजें अन्यथा………….

अरुण कुमार चौधरी

एक समय  तब था जब बिहार में बौद्धिक चेतना का का गढ माना जाता था! आज इसी बिहार में हजारों की संख्या में बच्चे देश के विभिन्न जगहों में शिक्षण से अपना भविष्य बना रहे हैं, इस लोकडाउन में बिहार के बच्चे दर-दर की ठोकरे खा कर रहे हैं !और कई बच्चे के माता पिता घर में    बच्चे के बिना का एक-एक घंटे समय बिताना पहाड़ ऐसा हो गया है ,बच्चे के माता- पिता मानसिक दबाव में है ! बच्चे जहां कोचिंग कर रहे हैं वहां पर खाने पीने के लिए लाले पड़ते जा रहे हैं ; इस सारी बातों के बाद भी बिहार का वर्तमान नीतीश सरकार बड़ी ही बेरुखी से बच्चों के प्रति असंवेदनशील बना हुआ है

एक समय ऐसा था कि बिहार के कुछ मजदूर कोलकाता जाते थे और फसल की कटाई के समय घर आकर अन्न संग्रह कर कर पुनः वापस कोलकाता चले जाते थे ,परंतु दिन – प्रतिदिन परंतु यानी 30 वर्षों से बिहार की स्थिति बद से बदतर होती गई! जयप्रकाश नारायण के चेले लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने 30 वर्षों तक बिहार का शासन किया, इन दोनों ने केवल जातीय समीकरण का गोटी बैठाकर अपना वर्चस्व कायम कर राज किया!इन 30 वर्षों में यानी कहिए बड़े भाई और छोटे भाई मिलकर बिहार को रसातल में कर दिया! अभी बिहार में जो चीनी मिलें थे, वे बंद पड़ें हैं! फतुवा का स्कूटर फैक्ट्री तथा अन्य कई लघु और मध्यम उद्योग  खंडहर के रूप में दिख रहा है! वहां पर फैक्ट्री के सारे के सारे मशीन के पुर्जे या तो चोरी हो गया या फिर बेकार पड़ा !अब वहां पर सिर्फ शाम के बाद लावारिस कुत्ते  भौकते रहते हैं, इस की दुर्दशा के लिए अब किसी भी दल का नेता  विरुद्ध में आवाज उठाने के लिए तैयार नहीं है !

इन्हीं सब कारणों से  बिहार के करीब एक करोड़ मजदूर देश की विभिन्न जगहों में अपनी रोजी-रोटी तथा परिवार को पालने के लिए हजारों किलोमीटर दूर जाकर जीवन- यापन करते हैं, परंतु अभी भारत तथा दुनिया में कोरोना  वायरस के कारण पूरे भारत में कारखाना का चक्का चलना बंद हो गया और मजदूर बेकार हो गए ,अब मजदूर के सामने जब भारी भूखमरी की स्थिति हुई, तब जाकर 40 दिनों के बाद मोदी सरकार का कान खड़ा हुआ और वह मजदूरों को अपने राज्य में भेजने के लिए बसों तथा विशेष मजदूर ट्रेन चलाने की बात कही है !ऐसी अभी हैदराबाद जयपुर तथा अन्य कई जगह से श्रमिक ट्रेन चलना शुरू किया है परंतु अभी बिहार में करीबन 60 से 70 लाख प्रवासी मजदूर है, जदयू के प्रवक्ता  आलोक जी के अनुसार ही अगर 35 से 40 लाख मजदूर बिहार आना चाहते , तो उस लाने के लिए करीबन 4000 ट्रेन चाहिए और जबकि आज ही रेलवे मंत्रालय ने सिर्फ 7 या 8 ट्रेन देश की विभिन्न राज्यों में मजदूरों के लिए स्पेशल ट्रेन चलाई है ,अगर रेलवे मंत्रालय का यही रवैया रहा, तो बिहार में प्रवासी मजदूरों को पहुंचने में करीबन 2 महीने लग जाएंगे !

इससे ऐसा लगता है मजदूरों को घर पहुंचाने के संबंध में केंद्र सरकार तथा बिहार सरकार एक लीपापोती कार्यक्रम बनाया है जो, कि सिर्फ दिखावटी है ,जो कि यह पूरी तरह सेअमनवीय तथा मजदूरों के प्रति  असंवेदनशील रवैया लगता है, दूसरी ओर कई राज्य के मुख्यमंत्री अब प्रवासी मजदूरों को कहने लगे हैं कि वे अब यहीं रहें हैं ,   और उन्हें जल्दी ही काम मिलना शुरू हो जाएगा! खास कर  हरियाणा के मुख्यमंत्री कह रहें हैं, सरकार कार्य की हम आपकी पूरी इंतजाम करेंगे !यह कैसी विडंबना है कि जब 40 दिनों तक मजदूर दर-दर की ठोकरें खा रहे थे तब कोई भी राज्य सरकार प्रवासी मजदूरों को रखने के लिए तैयार नहीं थे , सारे राज्य सरकार प्रवासी मजदूरों के प्रति खानापूर्ति का काम करते थे! मजदूरों को दो-दो दिन में एक बार का भोजन मिलता था और उसको भोजन को लेने में उन्हें करीब 3 से 4 घंटे लगते थे !अगर इन राज्यों में स्वयंसेवी संस्थाएं गरीबों को   मदद नहीं करते तो ,करीबन हजारों मजदूर भूखमरी से मौत हो जाती! ऐसे कोई भी राज्य सरकार मानने को तैयार नहीं है, परंतु जमीनी स्तर पर प्रवासी मजदूर की जिंदगी बड़ी ही दयनीय स्थिति में थी और है! ऐसे इस समय कोरोना की लड़ाई के साथ-साथ हमें आर्थिक  संकट से उबरने का भी काम करना होगा, जो कि इस समय केंद्र सरकार की मशीनरी गंभीर नहीं लग रही है!  और      यह बहुत ही दुखद बात है! मजदूरों के सामने भयंकर भुखमरी की स्थिति हो गई है, यह बात विश्व बैंक ने कहा है !इन सारी  बातों  से लगता है कि देश में कहीं कोरोना से ज्यादा भुखमरी से ही लोग मर जाएंगे

नीतीश  बाबू जल्द से जल्द प्रवासी मजदूरों को अपने घर भेजें! अन्यथा आगामी बिहार  विधानसभा चुनाव में पराजय के लिए के लिए तैयार रहें ।

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